Class 12 History Chapter 1 ईटें उनके तथा अस्थियाँ

Class 12 History Chapter 1 ईटें उनके तथा अस्थियाँ

1) ईटें उनके तथा अस्थियाँ (हड़प्पा सभ्यता)

1. हड़प्पा संस्कृति को सिंधु नदी की घाटी में फैले होने के कारण सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं। पुरातात्विक संस्कृति शब्द का प्रयोग पुरावस्तुओं के ऐसे समूह के लिए करते हैं जो एक विशिष्ट शैली के होते हैं और सामान्यतया एक साथ एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र तथा काल-खण्ड से संबंधित पाए जाते हैं।

2. इस सभ्यता का नामकरण हड़प्पा नामक स्थान जहाँ पर संस्कृति पहली बार खोजी गई थी के नाम पर किया गया है।

3. हड़प्पा संस्कृति के दो प्रसिद्ध केन्द्र हड़प्पा और मोहनजोदड़ो है।

4. हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921-22 में दया राम साहनी, रखालदास बनर्जी और सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में हुई।

5. हड़प्पा का का काल विकसित सभ्यता) 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।

6. हड़प्पा सभ्यता की जानकारी के प्रमुख स्त्रोत – खुदाई में मिली इमारतें, मृद भाण्ड, औजार आभूषण मूर्तियाँ मुहरें इत्यादि हैं।

7. हड़प्पा सभ्यता का विस्तार क्षेत्र – अफगानिस्तान, जम्मू, बलूचिस्तान (पाकिस्तान) गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश।

8. इसके प्रमुख स्थल – नागेश्वर, बालाकोट, चन्हुदड़ो, कोटदीजी, धौलावीरा, लोथल, कालीबंगन, बनावली, राखीगढ़ी इत्यादि।

9. यह एक नगरीय सभ्यता थी। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसकी नगर निर्माण योजना है।

10. हड़प्पा सभ्यता की बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी, दुर्ग तथा निचला शहर।

11. निचला शहर आवासीय भवनों के उदाहरण प्रस्तुत करता है तथा दुर्ग पर बनी संरचनाओं का प्रयोग संभवतः विशिष्ट सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए किया जाता था।

12. हड़प्पा सभ्यता में सड़कों तथा गलियों को एक ग्रिड पद्धति द्वारा बनाया गया था और ये एक दूसरे को समकोण पर काटती थी ।

13. जल निकाल प्रणाली अदभुत थी। घरों की नालियों को गली की नालियों से जोड़ा जाता था। नालियाँ पक्की ईटों से बनाई गई थी।

14. हड़प्पा सभ्यता में गेहूं, जौ, दाल, सफेद चना तथा तिल जैसे खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल का अनुमान है।

15. हड़प्पा सभ्यता में – भेड़बकरी, सुअर जैसे जानवरों के अस्तित्व का अनुमान है।

16. हड़प्पा में पाई जाने वाली लिपि को पढ़ने में विद्वान अभी तक असमर्थ है।

17. हड़प्पा की लिपि दाई से बाईं ओर लिखी जाती थी। इसमें चिह्नों की संख्या 375 से 400 के बीच थी।

18. हड़प्पा सभ्यता में बाट का प्रयोग संभवतः आभूषणों व मनकों को तोलने के लिए होता था जो चर्ट नामक पत्थर से बनाए जाते थे। बाटों के निचले मानदंड द्विआधारी थे।

19. चन्हुदड़ों शिल्प उत्पादन का एक प्रमुख केन्द्र था। शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातु कर्म, मुहर निर्माण तथा चर्ट बाट बनाना सम्मिलित थे।

20. मुहरों और मुद्रांकनों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था।

21. हड़प्पा स्थलों से मिले शवाधानों में आमतौर पर मृतकों को गर्तो में दफनाया गया था। इनके साथ मृदभाण्ड आदि के अवशेष मिले हैं। शवाधानों के अध्ययन से सामाजिक आर्थिक विभिन्नता का पता चलता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक वाले)

प्रश्न 1. हड़प्पा सभ्यता की खोज कब हुई ? किन विद्वानों के नेतृत्व में इसकी खोज हुई?

उत्तर: (संकेत – 1921-22, दयाराम साहनी, रखालदास बनर्जी और सर जॉन मार्शल

प्रश्न 2. हड़प्पा-पूर्व की बस्तियों की क्या विशेषताएँ थीं ?

उत्तर. (संकेत विशिष्ट मृदभाण्ड शैली, कृषि और पशुपालन प्रचलित)

प्रश्न 3. सर जॉन मार्शल कौन थे ?

उत्तर. (संकेत- भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर जनरल)

प्रश्न 4. हड़प्पा लिपि की कोई दो विशेषताएँ बताऐ।

उत्तर. (संकेत-चित्रात्मक लिपि, दाई से बाईं ओर लिखा जाना)

प्रश्न 5. हड़प्पावासियों द्वारा सिंचाई के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले साधनों के नामों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर. (तालाब, कुंआ, नहर)

प्रश्न 6. फयॉन्स क्या होता है ? इससे बने छोटे पात्रों को कीमती क्यों माना जाता था?.

उत्तर. घिसी हुई रेत, रंग तथा चिपचिपे पदार्थ के मिश्रण को पकाकर पात्र बनाया जाता था, कीमती क्योंकि इन्हें बनाना आसान नहीं

प्रश्न 7. हड़प्पा सभ्यता के किन देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे ?

उत्तर. (संकेत-सुमेर ईरान, इराक, मिस्र आदि)

प्रश्न 8. हड़प्पा सभ्यता के निवासी किन देवी-देवताओं की पूजा करते थे ?

उत्तर. (आद्य शिव मातृदेवीपशु, पक्षी और वृक्ष)

प्रश्न 9. हड़प्पा सभ्यता के किन्हीं चार प्रमुख क्षेत्रों के नाम बताएँ।

उत्तर. (संकेत, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, धौलावीरा)

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1. हड़प्पा सभ्यता के शहरों में लोगों को उपलब्ध भोजन सामग्री की सूची बनाइए। इन वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाले समूहों की पहचान कीजिए।

  • उत्तर: हड़प्पा शहरों के लोगों के लिए भोजन के निम्नलिखित सामान उपलब्ध थे:
  • अनाज:- गेहूं, जौ, मसूर, मटर, ज्वार, बाजरा, तिल, सरसों, राई, चावल आदि।
  • मवेशियों, भेड़, बकरी, भैंस, सुअर का मांस।
  • हिरण, सूअर, घड़ियाल आदि जैसे जंगली प्रजातियों का मांस।
  • पौधे और उनके उत्पाद।

इन वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाले समूहों की पहचान निम्नलिखत हैं:-

1. किसानों द्वारा अनाज उपलब्ध करवाया जाता था।

2. जैसे कि मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस इत्यादि पालतू थे, हड़प्पा स्वयं इनसे मांस प्राप्त करते थे।

3. जानवरों की जंगली प्रजातियों के मांस के बारे में हमें यकीन नहीं है कि हड़प्पा ने इसे कैसे प्राप्त किया, लेकिन हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह या तो शिकार समुदाय हो सकता है या शायद कुछ हड़प्पा-निवासी स्वयं ही इन जानवरों का शिकार करते थे।

4. पौधों और उनके उत्पादों के लिए हड़प्पा-निवासी स्वयं इसे इकट्ठा कर लेते थे।

प्रश्न 2. पुरातत्त्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता किस प्रकार लगाते हैं ? वे कौन सी भिन्नताओं पर ध्यान देते हैं ?

उत्तर: पुरातत्त्वविद निम्नलिखित विधियों और तकनीकों को अपनाकर हड़प्पा समाज में सामाजिक-आर्थिक मतभेदों का पता लगाते हैं:

शवाधान:-a. शवाधान गत में अंतर। b शवाधान में पूरावस्तुओं की उपस्थिति।

पुरातत्वविदों ने पाया है कि शवाधान में अंतर होता है:- कुछ कब्रें सामान्य बनी होती हैं तो कुछ कब्रों में ईंटों की चिनाई की गई होती है यद्यपि हड़प्पा निवासियों ने शायद ही कभी अपने किसी की मृत्युं के साथ कीमती सामग्री को दफनाया था, हालांकि कुछ कब्रों में मिट्टी के बर्तन, गहने,आभूषण शामिल थे जो अर्द्ध कीमती पत्थरों से बने थे।

2. ‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज:- पुरातत्त्वविद उन वस्तुओं को कीमती मानते थे जो दुर्लभ हों अथवा महँगी, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थों से अथवा जटिल तकनीकों से बनी हों। महँगे पदार्थो से बनी दुर्लभ वस्तुएँ सामान्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं और छोटी बस्तियों में ये विरले ही मिलती हैं।

प्रश्न 3. क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं कि हड़प्पा सभ्यता के शहरों की जल निकास प्रणाली, नगर-योजना की ओर संकेत करती है ? अपने उत्तर के कारण बताइए।

उत्तर:-ऐसा प्रतीत होता है कि पहले नालियों के साथ गलियों को बनाया गया और फिर इसके साथ घर बनाए गए थे। प्रत्येक घर के गंदे पानी की निकासी एक पाईप से होती थी जो सड़क और गली की नाली से जुड़ी होती थी।

शहरों में नक्शों से जान पड़ता है कि सड़कों और गलियों को लगभग एक ग्रिड प्रणाली से बनाया गया था और वह एक दूसरे को समकोण काटती थी। जल निकासी कि प्रणाली बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह कई छोटी बस्तियों में भी दिखाई पड़ती हैं। उदहारण के लिए लोथल में आवासों के बनाने के लिए जहाँ कच्ची ईंटों का प्रयोग किया गया हैं वहीँ नालियों को पक्की ईंटों से बनाया गया हैं।

प्रश्न 4. हड़प्पा सभ्यता में मनके बनाने के लिए प्रयुक्त पदार्थों की सूची बनाइए। कोई भी एक प्रकार का मनका बनाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थों की विविधता उल्लेखनीय है:- इसमें कार्नीलियन (सुन्दर लाल रंग का), जैस्पर, स्फटिक, क़्वार्ट्ज़ और सेलखड़ी जैसे पत्थर; ताँबा, काँसा तथा सोने जैसे धातुएँ; तथा शंख, फ़यॉन्स और पक्की मिट्टी, सभी का प्रयोग मनके बनाने में होता था। कुछ मनके दो या उससे अधिक पत्थरों को आपस में जोड़कर बनाए जाते थे और कुछ सोने के टोप वाले पत्थर के होते थे।

मनका बनाने की प्रक्रिया:

पहला चरण:- (मनके को आकर देना): सबसे पहले, मनके बनाने की प्रक्रिया में प्रयुक्त पदार्थ के अनुसार भिन्नताएँ थीं। उदहारण के तोर पर सेलखड़ी जो एक मुलायम पत्थर है, पर आसानी से कार्य हों जाता था।

दूसरा चरण:- (मनके को रंग देना): इसमें पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पकाकर प्राप्त किया जाता था।

तीसरा चरण:- पत्थरों के पिंडों को पहले अपरिष्कृत आकारों में तोड़ा जाता था और फिर बारीकी से शल्क निकाल कर इन्हें अंतिम रूप दिया जाता था।

चौथा;- (अंतिम चरण): प्रक्रिया के अंतिम चरण में घिसाई, पॉलिश और इनमें छेद करना शामिल थे। चंहुदड़ो , लोथल और हाल ही में धौलावीरा से छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं।

प्रश्न 5. नीचे दिए गए चित्र को देखिए और उसका वर्णन कीजिए। शव किस प्रकार रखा गया है? उसके समीप कौन-सी वस्तुएँ रखी गई हैं ? क्या शरीर पर कोई पुरावस्तुएँ हैं ? क्या इनसे कंकाल के लिंग का पता चलता है ?

उत्तर: चित्र को देखकर शव के संबंध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जाते हैं:- शव एक गर्त में रखा हुआ है। यह उत्तर दक्षिण दिशा में रखा हुआ है। शव के समीप सिर की तरफ मृदभांड रखे हैं, इनमें मटका, जार आदि शामिल है। शव पर पुरावस्तुएँ हैं विशेषतः कंगन आदि आभूषण हैं। ऐसा लगता है कि ये वस्तुएँ मृतक द्वारा अपने जीवन काल में प्रयोग की गई थीं और हड़प्पाई लोगों का विश्वास था कि वह अगले जीवन में भी उनका प्रयोग करेगा। शव को देखकर उसके लिंग के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसा लगता है कि यह किसी महिला का शव है। निप्रतिशित पर एक तप निबंध तिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6 मोहनजोदड़ो की कुछ विशिष्टताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:- मोहनजोदड़ो सिंधु के लरकाना जिले में स्थापित था। सिंधी भाषा के अनुसार मोहनजोदड़ो का अर्थ है मृतको अपना प्रेतों का टीला। यह नाम मोहनजोदड़ो के पतन के बाद इसे दिया गया। 5000 वर्ष पहले यह एक विकसित शहरा। यह सात बार स्थापित होकर पुनः नष्ट द्रःआ। इस पुरास्थल की खोज हड़या के बाद ती हुई थी रांभवतः हड़्या सभ्यता का सर्वाधिक अनोखा पक्ष शहरी केंद्रों का विकास था। ऐसे ही बद्रों में एक महत्वपूर्ण केंद्र मोहनजोदड़ो था। इसकी सुदाई रे नितिखित विशिष्टताऐँ प्रकट दुई है

* सुनियोजित नगर :-

1 मोहनजोदड़ो एक विभात नाहर धा जो 125 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। यह शाहर दो भागों में विभक्त पा| गाहर के पश्चिम में एक दुर्ग या किला था और पूर्व में भीचे एक नगर बसा आया।

2 दुर्ग की संरचनाएं काली ईटों के ऊँचे चबूतरे पर बनाई गई थी। इसमें बड़े बड़े भवन थे, जो सभवतः प्रशासनिक अथवा धार्मिक केंद्री के रूप में कार्य करते थे।

3 दुर्ग के चारों ओर ईटी की दीवार पी.जो दुर्ग को निवते शहर से अलग करती थी दुर्ग में मासक और मासक वर्ग से सबंधित लोग रहते थे।

4. निवले शहर का क्षेत्र दुर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा था। इसमें रिहायशी क्षेत्र होते थे. जिनमें सामान्य जन अर्थात् मियी आदि रहते थे। निचले शहर के चारों ओर भी दीवार बनाई गई थी। निवले शहर में अनेक भवनो को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था।

5 नगर में प्रवेश करने के लिए परकोटे अर्थात बाहरी चारदीवारी में कई बड़े बड़े प्रवेशद्वार थे।

6 नगर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में प्रवेश करने के लिए आतरिक चारदीवारी में प्रवेशद्वार थे।

7. नगर में अलग-अलग दिशा में ऊंची दीवार से घिरे हुए कई सेक्टर थे।

8. सभी बड़े मकानों में रसोईघर, स्नानागार मोचालय और कुए होते थे। सभी बड़े मकानों नया लगभग एक जैसा या एक दौरस आँगन और चारों तरफ कई कमरे।

9.घर के दरवाजे और खिड़कियाँ प्रायः सड़क की ओर नहीं खुलते थे। बड़े घरों में सामने के दरवाजे के चारों ओर एक कमरा अर्थात् पोल बना दिया जाता था ताकि सामने के मुख्यद्वार से घर के अंदर ताक झाँक न की जा सके |

* सुव्यवस्थित सड़के एवं नालियाँ :-

मोहनजोदड़ो की महत्वपूर्ण विशेषताएं इसकी सुख्यवस्दित सड़ते एवं नालियों थी।

1 सड़के पूर्व रो पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की तरफ बिछी होती थी और नगरको नेकरो मे विभाकरती थी।

2 सड़कों का निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि स्वयं हवा सो ही उनकी सगाई होती रहती थी।

3 मोहनजोदड़ो की सड़कों की चौड़ाई 135 फुट से 20 फुट तक थी। नातियाँ प्रापः पुट से 12 फुट पी।

4 नालियाँ पकी ईटों से बनी तथा ढकी हुई होती थीं। उनमें थोड़ी थोड़ी दूरी पर हटाने वाले पर तगे हो आवश्यकतानुसार नालियों की सफाई की जा सके।

5 मतजत की निकासी के लिए मुख्य कनालों पर घोड़ी थोड़ी दूरी पर आपातकार होटि बनी होती थी।

6 एक टोडा मेहराबदार नाता सपूर्ण नगर के गदे पानी को बाहर ले जाता था।

* विशात नानागार, अनागार एवं भवन :-

1. मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक भवन स्नानागार है। इसका जलाशय दुर्ग के टीले में है। उत्तम कोटि की पकी ईंटों से बना स्नानागार स्थापत्यकला का सुंदर उदाहरण है। इस संरचना के अनोखेपन तथा दुर्ग क्षेत्र में कई विशिष्ट संरचनाओं के साथ, इसके मिलने से ऐसा लगता है कि इसका प्रयोग धर्मानुष्ठान संबंधी स्नान के लिए, किया जाता होगा, जो आज भी भारतीय जनजीवन का आवश्यक अंग है।

2. मोहनजोदड़ो की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता दुर्ग में मिलने वाला विएल अन्नागार है। इसमें ईंटों से बने सत्ताईस खंड (Blocks) थे, जिनमें प्रकाश के लिए आड़े-तिरछे रोशनदान बने हुए थे। अन्न भंडार के दक्षिण में ईंटों के चबूतरों की कई कतारें थीं। इन चबूतरों में से एक चबूतरे के मध्य भाग में एक बड़ी ओखली का बना निशान मिला है।

3. मोहनजोदड़ो के दुर्ग क्षेत्र में विशाल स्नानागार की एक तरफ एक लंबा भवन (280 x 78 फुट) मिला है। इतिहासकारों के मतानुसार यह भवन किसी बड़े उच्चाधिकारी का निवास स्थान रहा होगा। महत्त्वपूर्ण भवनों में एक सभाकक्ष भी था, जिसमें पाँच-पाँच ईंटों की ऊँचाई की चार चबूतरों की पंक्तियाँ थीं। ये ऊँचे चबूतरे ईंटों के बने थे और उन पर लकड़ी के खंभे खड़े किए गए थे। इसके पश्चिम की ओर कमरों की एक कतार में एक पुरुष की प्रतिमा बैठी हुई मुद्रा में पाई गई है।

* कुशल एवं व्यवस्थित नागरिक प्रबंध :-

मोहनजोदड़ो का नागरिक प्रबंध अत्यधिक कुशल एवं व्यवस्थित था। यद्यपि यह कहना कठिन है कि हड़प्पा सभ्यता के शासक कौन थे; संभव है वे राजा रहे हों या पुरोहित अथवा व्यापारी। कांस्यकालीन सभ्यताओं में आर्थिक, धार्मिक एवं प्रशासनिक इकाइयों में कोई स्पष्ट भेद नहीं था। एक ही व्यक्ति प्रधान पुरोहित भी हो सकता था, राजा भी हो सकता था और धनी व्यापारी भी। किंतु इतना अवश्य कि मोहनजोदड़ो का नागरिक प्रबंध कुशल

हाथों में था। प्रशासन अत्यधिक कुशल एवं उत्तरदायी था। सुनियोजित नगर, सफाई और जल-निकास की उत्तम व्यवस्था, अच्छी सड़कें रात्रि के समय प्रकाश की व्यवस्था, यात्रियों की सुविधा के लिए सरायों की व्यवस्था, उन्नत व्यापार, माप-तौल के एकरूप मानक, सांस्कृतिक विकास, विकसित उद्योग-धंधे, संपन्नता आदि सभी इसके प्रबल प्रमाण हैं।

प्रश्न 7.हड़प्पा सभ्यता में शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की सूची बनाइए और चर्चा कीजिए कि ये किस प्रकार प्राप्त किए जाते होंगे?

उत्तरः-हड़प्पा सभ्यता के लोगों की शिल्प तथा उद्योग संबंधी प्रतिभा उच्चकोटि की थी। मिट्टी और धातु के बर्तन बनाना, मूर्तियाँ, औजार एवं हथियार बनाना, सूत एवं ऊन की कताई, बुनाई एवं रंगाई, आभूषण बनाना, मनके बनाना, लकड़ी का सामान विशेष रूप से कृषि संबंधी उपकरण, बैलगाड़ी तथा नौकाएँ बनाना आदि उनके महत्त्वपूर्ण व्यवसाय थे। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, लोथल, धौलावीरा, नागेश्वर बालाकोट आदि शिल्प उत्पादन के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। चन्हुदड़ो की छोटी-सी बस्ती (7 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत) लगभग पूरी तरह शिल्प उत्पादन में लगी हुई थी।

* शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल :-

विभिन्न प्रकार के शिल्प उत्पादनों के लिए अनेक प्रकार के कच्चे माल की आवश्यकता थी। उदाहरण के लिए, चिकनी मिट्टी, पकी मिट्टी, ताँबा, टिन, काँसा, सोना, चाँदी, शंख, सीपियाँ, कौड़ियाँ, विभिन्न प्रकार के पत्थर जैसे-अकीक, नीलम, स्फटिक, क्वार्ज, सेलखड़ी आदि, मिट्टी के बर्तन, सुइयाँ, फयान्स, तकलियाँ मनके, सुगंधित पदार्थ, कपास, सूत, ऊन, विभिन्न प्रकार की लकड़ियाँ, हड्डियाँ, घिसाई, पालिश और छेद करने के औजार आदि विभिन्न शिल्प उत्पादनों के लिए आवश्यक थे।

कच्चा माल प्राप्त करने के स्रोत :-

विभिन्न शिल्प उत्पादों के लिए आवश्यक कच्चा माल अनेक उपायों द्वारा प्राप्त किया जाता था। कुछ कच्चा माल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध था, किंतु कुछ जलोढ़क मैदान के बाहर से मँगवाना पड़ता था। इस प्रकार हड़प्पा सभ्यता के लोग शिल्प उत्पादनों के लिए उपमहाद्वीप और बाहर से कच्चा माल अनेक उपायों द्वारा प्राप्त करते थे।

1. वस्त्र निर्माण के लिए सूत कपास से प्राप्त किया जाता था। कपास की खेती की जाती थी। ऊनी कपड़ों के निर्माण के लिए ऊन भेड़ों से प्राप्त किया जाता था।

2. ईंटों, मिट्टी के बर्तनों, मूर्तियों एवं खिलौनों के लिए चिकनी मिट्टी स्थानीय रूप से उपलब्ध हो जाती थी। चोलीस्तान (पाकिस्तान) और बनावली (हरियाणा) से मिलने वाले मिट्टी के हल साक्षी हैं कि वहाँ उत्तम कोटि की चिकनी मिट्टी मिलती थी।

3. हड्डयाँ विभिन्न पशुओं से प्राप्त की जाती थीं। मछलियों की हड्डियाँ मछुआरों से, पक्षियों की हड्डियाँ तथा जंगली पशुओं की हड्डियों शिकारियों से अथवा स्वयं शिकार करके प्राप्त की जाती थीं।

4. लकड़ी के हलों, विभिन्न वस्तुओं, औज़ारों एवं उपकरणों के निर्माण के लिए लकड़ी आस-पास के जंगलों से प्राप्त की जाती थी। बढ़िया किस्म की लकड़ी मेसोपोटासिया से मँगवाई जाती थी।

5. सुगंधित द्रव्यों को बनाने के लिए फयान्स जैसे मूल्यवान पदार्थ मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त किए जाते थे।

6. हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने उन-उन स्थानों में अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं जिन-जिन स्थानों से आवश्यक कच्चा माल सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सकता था। उदाहरण के लिए, इन्होंने नागेश्वर और बालाकोट में, जहाँ से शंख सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता था, अपनी बस्तियाँ स्थापित की थीं।

7. वे कार्नीलियन मनके गुजरात से, सीसा दक्षिण भारत से और लाजवर्द मणियाँ कश्मीर और अफगानिस्तान से लेते थे।

8. उन्होंने सुदूर अफगानिस्तान में शोर्तुघई में अपनी बस्ती स्थापित की क्योंकि यह स्थान नीले रंग के पत्थर यानी लाजवर्द मणि के सबसे अच्छे स्रोत के निकट था। इसी प्रकार लोथल जो कार्नीलियन (गुजरात में भडौंच), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान और उत्तरी गुजरात से) एवं धातु (राजस्थान से) के स्रोतों के निकट स्थित था।

9.सिंधु सभ्यता के लोग कच्चे माल वाले क्षेत्रों में अभियान भेजकर भी वहाँ से कच्चा माल प्राप्त करते थे। इन अभियानों का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय लोगों के साथ संपर्क स्थापित करना होता था। वे अभियान भेजकर राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र से ताँबा और दक्षिण भारत से सोना प्राप्त करते थे।

10. हड़प्पाई लोग संभवतः अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित ओमान से भी ताँबा मँगवाते थे। हड़प्पाई पुरावस्तुओं और ओमानी ताँबे दोनों में निकल के अंशों का मिलना दोनों के साझा उद्भव का परिचायक है। व्यापार संभवतः वस्तु विनिमय के आधार पर किया जाता था। वे बड़ी-बड़ी नावों एवं बैलगाड़ियों पर अपने तैयार माल को पड़ोस के इलाकों में ले जाते थे तथा उनके बदले धातुएँ तथा अन्य आवश्यक सामान ले आते थे। इन क्षेत्रों से जब- तब मिलने वाली हड़प्पाई पुरावस्तुओं से ऐसे संपर्को का संकेत मिलता है।

प्रश्न 8. चर्चा कीजिए कि पुरातत्वविद किस प्रकार अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं?

उत्तर:जैसा कि हम देखते हैं कि विद्वानों को हड़प्पा में पाई गई लिपियों को पढ़ने में सफलता नहीं मिली। ऐसे में पुरातत्वविदों के लिए पुरावस्तुएँ ही हड़प्पा संस्कृति के पुनर्निर्माण में सहायक रही हैं। जैसे मिट्टी के बर्तन, औजार, आभूषण, धातु, मिट्टी और पत्थरों की घरेलू वस्तुएँ आदि। अजलनशील कपड़ा,लकड़ी और रस्सी आदि लुप्त हो चुके हैं।

कुछ चीजें ही बची हैं, जैसे पत्थर, चिकनी मिट्टी, धातु और टेराकोटा आदि। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि शिल्पियों द्वारा कार्य करते हुए कुछ प्रस्तर पिंड और अपूर्ण वस्तुओं को उत्पादन के स्थान पर काटते या बनाते समय फेंक दिया जाता था, जिन्हें पुन: निर्मित नहीं किया जा सकता था। यही पुरावस्तुएँ हमारे लिए उपयोगी साबित हुई हैं। नहीं तो हमें संस्कृति के महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी अधूरी ही प्राप्त होती। पुरातत्वविदों ने उन्हीं पुरावस्तुओं के आधार पर मानव जाति के क्रमिक विकास को चिहनित किया है। उनका वर्गीकरण धातु, मिट्टी, पत्थर, हड्डियों आदि में किया गया है।

पुरातत्वविदों ने दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रभाव मौसम और उन तत्कालीन कारणों को माना जो उन्हें आभूषणों और औज़ारों आदि पर दिखाई दिए। पुरातत्वविद पुरा वस्तुओं की पहचान एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया द्वारा करते हैं। जैसे किसी संस्कृति विशेष में रहने वाले लोगों के बीच क्या सामाजिक और आर्थिक भिन्नताएँ थीं।

जैसे हड़प्पा सभ्यता कालीन मिस्र के पिरामिडों में कुछ राजकीय शवाधान प्राप्त हुए, जहाँ बहुत बड़ी मात्रा में धन संपत्ति दफनाई गई थी। पुरातत्वविदों ने कुछ घटनाओं को अनुमानित भी किया है। उदाहरणस्वरूप पुरातत्वविदों ने हड़प्पाई धर्म को अनुमान के आधार पर आँका है। अर्थात् कुछ विद्वान वर्तमान से अतीत की ओर बढ़ते हैं। कुछ नीतियाँ पात्रों के संबंध में और पत्थर की चक्कियों के बारे में युक्तिसंगत रही हैं तो कुछ धार्मिक प्रतीकों के संबंध में शंकाग्रस्त रहीं, जैसे कई मुहरों पर रुद्र के चित्र अंकित हैं। पुरावस्तुओं की उपयोगिता की समझ हम आधुनिक समय में प्रयुक्त वस्तुओं से उनकी समानता के आधार पर ही लगाते हैं।

उदाहरणस्वरूप कुछ हड़प्पा स्थलों पर मिले कपास के टुकड़ों के विषय में जानने के लिए हमें अप्रत्यक्ष साक्ष्यों जैसे मूर्तियों के चित्रण पर निर्भर रहना पड़ता है तथा कुछ वस्तुएँ पुरातत्वविदों को

अपरिचित लगीं तो उन्होंने उन्हें धार्मिक महत्त्व की समझ ली। कुछ मुहरों पर भी अनुष्ठान के दृश्य, पेड़-पौधे अर्थात् प्रकृति की पूजा के संकेत मिलते हैं तथा पत्थर की शंक्वाकार वस्तुओं को लिंग के रूप में दर्शाया गया है। पुरातत्त्वविदों ने कोटदीजी सिंधु नदी के तट पर 39 फीट नीचे मानव जीवनवृत्ति के अवशेष प्राप्त किए हैं। कौशांबी के निकट चावल और हड़प्पाकालीन मिट्टी के बर्तन मिले हैं। लोथल से बाँट, चूड़ियाँ और पत्थर के आभूषण भी प्राप्त हुए हैं। काले और लाल रंग की मिट्टी के बर्तन, आकृतियाँ और अवशेष मिले हैं। पुरातत्वविदों ने विभिन्न वैज्ञानिकों की मदद से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा पर कार्य किए हैं। कई अन्वेषण, व्याख्या और विश्लेषण से निष्कर्ष निकाले हैं, जिनमें कुछ असफल भी रहे।

प्रश्न 9. हड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा किए जाने वाले संभावित कार्यों की चर्चा कीजिए।

उत्तर:-हडप्पा सभ्यता के राजनैतिक संगठन के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना कठिन है। हमें ज्ञात नहीं है कि हड़प्पा के शासक कौन थे; संभव है वे राजा रहे हों या पुरोहित अथवा व्यापारी। कांस्यकालीन सभ्यताओं में आर्थिक, धार्मिक एवं प्रशासनिक इकाइयों में कोई स्पष्ट भेद नहीं था। एक ही व्यक्ति प्रधान पुरोहित भी हो सकता था, राजा भी हो सकता था और धनी व्यापरी भी। हंटर महोदय यहाँ के शासन को जनतंत्रात्मक शासन मानते हैं किंतु, पिग्गाट और व्हीलर के मतानुसार सुमेर एवं अक्कड़ के समान हड़प्पा में भी पुरोहित राजा शासन करते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा साम्राज्य पर दो राजधानियों-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से शासन किया जाता था।

कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार संभवतः संपूर्ण क्षेत्र अनेक राज्यों, रजवाड़ों में विभक्त था और उनमें से प्रत्येक की एक अलग राजधानी थी; जैसे-सिंधु में मोहनजोदड़ो, पंजाब में हड़प्पा, राजस्थान में कालीबंगन और गुजरात में लोथल। कुछ अन्य

विद्वानों के मतानुसार हड़प्पा सभ्यता में अनेक राज्यों का अस्तित्व नहीं था अपितु यह एक राजा के नेतृत्व में एक ही राज्य था। हड़प्पा सभ्यता के शासन का स्वरूप चाहे जो भी हो, इतना तो निश्चित है कि प्रशासन अत्यधिक कुशल एवं उत्तरदायी था।

हड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों को किया जाता होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि शासक राज्य में शांति व्यवस्था को बनाए रखने तथा आक्रमणकारियों से अपने राज्य की । सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था। हड़प्पा सभ्यता के सुनियोजित नगर, सफाई तथा जल निकास की उत्तम व्यवस्था, अच्छी सड़कें, उन्नत व्यापार, माप-तौल के एकरूप मानक, सांस्कृतिक विकास, विकसित उद्योग-धंधे, संपन्नता आदि सभी इस तथ्य के प्रबल प्रमाण हैं कि हड़प्पा के शासक प्रशासनिक कार्यों में विशेष रुचि लेते थे। संभवतः हड़प्पा के शहरों की योजना में भी राज्य का महत्त्वपूर्ण भाग रहा होगा।

इतिहासकारों का विचार है कि प्राचीन विश्व में जहाँ-जहाँ नियोजित वस्तुओं के प्रमाण मिलते हैं वहाँ-वहाँ इस बात का पता चलती है कि सड़कों की योजना का विकास धीरे-धीरे नहीं हुआ अपितु एक विशेष ऐतिहासिक समय में इसका निर्माण हुआ और अनेक विषयों में बस्ती को फिर से बसाने के कारण ऐसा किया गया। इतिहासकारों का विचार है कि हड़प्पा के शहरों की ईंटों का एक जैसा आकार या तो ‘कड़े प्रशासनिक नियंत्रण के कारण था या इसलिए कि लोगों को व्यापक पैमाने पर ईंट बनाने । के लिए नियुक्त किया गया होगा। इसी प्रकार, हड़प्पा के विभिन्न स्थानों पर एक ही प्रकार के ताँबे, काँसे और मिट्टी के बर्तन मिलने से भी यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। इसी प्रकार यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि विभिन्न नगरों की योजना भी राज्य द्वारा बनाई गई होगी और विभिन्न स्थलों पर सड़कों और नालियों के निर्माण का कार्य भी राज्य ने किया होगा। उल्लेखनीय है कि हड़प्पा के शहरी केंद्रों की योजना का अध्ययन करने पर वहाँ की नागरिक व्यवस्थाओं की देख-रेख और एक विशाल जल और निकास व्यवस्था का पता चलता है। निकास के लिए प्रत्येक गली में नाली बनी होती थी।

गली में बनी यह नाली पूरे शहर नियोजन का एक भाग थी। घर अपने-अपने ढंग से अलग-अलग इस कार्य को नहीं कर सकते थे। इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि प्रशासन द्वारा स्वयं सभी कार्यों को नियंत्रित किया जाता था तथा इनकी देख-रेख का कार्य किया जाता था। ऐसा लगता है कि शिल्प उत्पादन और वितरण का कार्य भी शासकों द्वारा नियंत्रित होता था; यही कारण था कि कुछ उद्योग विशेष रूप से कम वजन वाले कच्चे माल अथवा ईंधन के स्रोत के निकट स्थित होते थे और कुछ वहाँ स्थित थे जहाँ उनकी खपत सबसे अधिक थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगरों में विशाल अन्नागारों का मिलना इसका प्रबल प्रमाण है कि हड़प्पाई शासकों को सदैव प्रजाहित की चिंता रहती थी, इसीलिए अनाजे को विशाल अन्नागारों में सुरक्षित रख लिया जाता था ताकि किसी भावी आपात स्थिति में उसका प्रयोग किया जा सके।

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