Class 12 History Chapter 2 राजा किसान और नगर

2) राजा किसान और नगर (आरंभिक राज्य और. अर्थव्यवस्था (लगभग 600 ई. पू. से 600 ई)

2) राजा किसान और नगर (आरंभिक राज्य और. अर्थव्यवस्था (लगभग 600 ई. पू. से 600 ई)

1. जेम्स प्रिंसेप के द्वारा 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का अर्थ निकाला गया। जिनसे राजा असोक के अभिलेखों और सिक्कों का पता

2. छठी शताब्दी ई. पूर्व को एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल माना जाता है। इसका कारण आरंभिक राज्यों व नगरों का विकासलोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों का प्रचलन है।

3. इस काल में 16 महाजनपदों का उदय हुआ जिनमें मगध, कौशल, कुरू पांचाल, गांधार, वजिज, अवंति आदि प्रमुख थे।

4. बौद्ध ग्रंथों के अनुसार असोक सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक।

5. चन्द्रगुप्त मौर्यमौर्यवंश का संस्थापक था। मौर्य साम्राज्य भारत का पहला साम्राज्य।

6 . मौर्य तथा गुप्त साम्राज्य की जानकारी के स्त्रोत

7. मौर्य साम्राज्य में पाँच प्रमुख राजनीतिक केन्द्र , राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांत – तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसाली और सुवर्णगिरी।

8. मेगस्थनीज द्वारा सैनिक गतिविधियों के संचालन हेतु एक समिति और छ: उपसमितियों का उल्लेख । जिनके कार्य नौसेना का, यातायात और खान-पान का, पैदल सैनिकों का, अश्वारोहियों का, रथारोहियों का तथा हाथियों का संचालन।

9. चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य का उदय। सामंतवाद का उदय संभवतः इसी काल से माना जाता है।

10. दक्षिण के राजा और सरदार-चोलचेर और पाण्डेय जैसे समृद्ध और स्थायी राज्यों का उदय।

11. छठी शताब्दी ई. पूर्व से उपज बढ़ाने के लिए लोहे के फाल वाले हलों का प्रयोग।

12. छठी शताब्दी . पूर्व से छठी शताब्दी के काल में व्यापार के लिए सिक्कों के प्रचलन से विनिमय आसान हो गया।

13. उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिए राजाओं द्वारा देवी-देवताओं के साथ जुड़ना।

14. द्वितीय शताब्दी के कई नगरों से छोटे दानात्मक अभिलेखों से विभिन्न व्यवसायों की जानकारी जैसे धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, धार्मिक गुरू, व्यापारी आदि।

15. उत्पादकों और व्यापारियों के संघ? (श्रेणी) का उल्लेख मिलता है। श्रेणियाँ संभवत पहले कच्चे माल को खरीदती थी, फिर उनसे सामान तैयार कर बाजार में बेच देती थी।

16. छठी शताब्दी .पूसे उपमहाद्वीप में नदी मागों और भूमार्गों का जाल कई दिशाओं में फैला। अरब सागर से उ , अफ्रीका, पश्चिम एशिया तक और बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिण पूर्व एशिया तक।

17. गुप्त काल के अन्तिम समय सिक्कों में कमी आर्थिक गिरावट की ओर इशारा करती है।

18. अभिलेख साक्ष्य इतिहास के प्रमुख स्रोत अभिलेख शास्त्रियों द्वारा अभिलेखों के। अध्ययन से बीते काल की भाषा, राजा का नामतिथि, संदेश आदि की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त।

19 अभिलेख साक्ष्यों की सीमाएँ:- अक्षरों का हल्के ढंग से उत्कीर्ण होना , अभिलेखों के टूट जाने से कुछ अक्षरों का लुप्त हो जाना, वास्तविक अर्थ न निकाल , प्रक्रियाओं व रोजमर्रा की जिंदगी के पाना, भाषा समझ न आना, दैनिक सुखदुख का उल्लेख अभिलेखों में न मिलना।

20. प्रस्तर मूर्तियों सहित मौर्यकालीन समस्त पुरातत्व एक अदभुत कला के प्रमाण थे। जो मौर्य साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं।

21. कुषाण शासकों ने स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने नाम के आगे “देवपुत्र” उपाधि भी धारण की संभवतवे चीन के शासकों से प्रेरित थे, जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे।

22. कषाण शासकों के राजधर्म को जानने के सर्वोत्तम प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक वाले)

प्रश्न 1. अभिलेख किसे कहते हैं ?

उत्तर (संकेत-पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन पर खुदे लेख)

प्रश्न 2. जेम्स प्रिंसेप कौन थे ?

उत्तर (संकेत – ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि को पढ़ने में सक्षम)

प्रश्न 3. संगम ग्रंथ क्या है ?

उत्तर (तमिल भाषा का ग्रंथ)

प्रश्न 4. असोक के अभिलेख मुख्यतकिन लिपियों में मिलते हैं ?

उत्तर (खरोष्ठी और ब्राह्मी लिपि)

प्रश्न 5 . ‘आहत’ सिक्कों से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर (संकेत – प्रतीक चिन्हों को आहत कर के बनाया जाता)

प्रश्न 6. असोक के अभिलेखों की भाषा क्या है ?

उत्तर (संकेत-पालि, प्राकृत)

प्रश्न 7. ‘श्रेणी’क्या थी ? इसका क्या कार्य था ?

उत्तर (संकेत-व्यापारियों का संघ, कच्चा माल खरीदना, सामान तैयार कर बाजार में बेचना)

प्रश्न 8. असोक के सिंह शीर्ष को आज क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?

उत्तर (संकेत भारत सरकार के राष्ट्रीय चिह्न के रूप में अपनाया जाना )

प्रश्न 9. अग्रहार’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर (संकेत-ब्राह्मणों को दान में दिया गया भू-भाग)

प्रश्न 10. कनिष्क कौन था ?

उत्तर (कुषाण वंश का सबसे शक्तिशाली शासक)

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1. आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं ?

उत्तर: आरंभिक ऐतिहासिक नगरोंका उदय छठी सदी ई०पू० में हुआ। इनके शिल्प उत्पाद निम्नलिखित प्रकार से थे:- इस काल में मिट्टी के उत्तम श्रेणी के कटोरे व थालियाँ बनाई जाती थीं। इन बर्तनों पर चिकनी कलई चढ़ी होती थी। इन्हें उत्तरी काले पॉलिश मृदभांड (N.B.P.W.) के नाम से जाना जाता है। नगरों में लोहे के उपकरण, सोने, चाँदी के गहने, लोहे के हथियार, बर्तन (कांस्य व ताँबे के), हाथी दाँत का सामान, शीशे, शुद्ध व पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं। भूमि अनुदान पत्रों से जानकारी मिलती है कि नगरों में वस्त्र बनाने का कार्य, बढ़ई का कार्य, आभूषण बनाने का कार्य, मृदभांड बनाने का कार्य, लोहे के औजार, उपकरण बनाने का कार्य होता था।

हड़प्पा के नगरों से तुलना: हड़प्पा के शिल्प उत्पादों तथा आरंभिक ऐतिहासिक नगरों के शिल्प उत्पादों में काफी भिन्नता पाई जाती है। हड़प्पा सभ्यता के शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातु-कर्म, मुहर बनाना तथा बाट बनाना सम्मिलित थे। परंतु हड़प्पा केलोग लोहे के उपकरण नहीं बनाते थे। उनके उपकरण पत्थर, कांस्य व ताँबे के थे। दूसरी ओर, प्रारंभिक नगरों के लोग बड़ी मात्रा में लोहे के औजार, उपकरण और वस्तुएँ बनाते थे।

प्रश्न 2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: छठी सदी ई०पू० के बौद्ध और जैन ग्रंथों में हमें 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में हमें इन राज्यों के नामों का उल्लेख मिलता हैं। विशिष्ट अभिलक्षण – इन महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण निम्नलिखित प्रकार से हैं:-अधिकांश जनपदों में राजतंत्रात्मक प्रणाली थी जिसमें राजा सर्वोच्च व वंशानुगत था, लेकिन निरंकुश नहीं था। मन्त्रिपरिषद् अयोग्य राजा को पद से हटा दिया करती थी।

कुछ महाजनपदों में गणतंत्रीय व्यवस्था थी। इन्हें गण या संघ कहते थे। गणराज्यों का मुखिया ‘गणमुख्य’ कहलाता था। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन करते थे। ये ‘राजन’ (राजा) कहलाते थे। वह अपनी परिषद् के सहयोग से राज्य करता था। वस्तुत: इन गण राज्यों में कुछ लोगों के समूह का शासन होता था। प्रत्येक महाजनपद की अपनी राजधानी थी जिसकी किलेबंदी की जाती थी।

इस काल में रचित धर्मशास्त्रों में शासक तथा लोगों के लिए नियमों का निर्धारण किया गया है। इन शास्त्रों में राजा को यह सलाह दी गई कि वह कृषकों, व्यापारियों और दस्तकारों से कर प्राप्त करे। पड़ोसी राज्य पर हमला कर धन लूटना या प्राप्त करना वैध उपाय बताया गया। धीरे-धीरे इनमें से कई राज्यों ने स्थायी सेना और नौकरशाही तंत्र का गठन कर लिया था परंतु कुछ राज्य अभी भी अस्थायी सेना पर निर्भर थे।

प्रश्न 3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं ?

उत्तर: सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने में इतिहासकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सामान्य लोगों ने अपने विचारों और अनुभवों के संबंध में शायद ही कोई वृत्तांत छोड़ा हो। फिर भी इतिहासकार सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करते हैं क्योंकि इतिहास निर्माण में इन लोगों के द्वारा ही अहम् भूमिका निभाई गई। इस कार्य को पूरा करने के लिए इतिहास विभिन्न प्रकार के स्रोतों का सहारा लेते हैं।

विभिन्न स्थानों पर खुदाई से अनाज के दाने तथा जानवरों की हड्डियाँ मिलती हैं जिससे यह पता चलता है कि वे किन फसलों से परिचित थे तथा किन पशुओं का पालन करते थे। भवनों और मृदभांडों से उनके घरेलू जीवन का पता चलता है। अभिलेखों से शिल्प उत्पादों का पता चलता है। भूमि अनुदान पत्रों से भी ग्रामीण जीवन की झांकी का पता चलता है। इनमें ग्राम के उत्पादन तथा ग्राम के वर्गों की जानकारी मिलती है।

कुछ साहित्य भी सामान्य लोगों के जीवन पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए जातक कथाओं और पंचतंत्र की कहानियों से इस प्रकार के संदर्भ निकाले जाते हैं। विभिन्न ग्रंथों में नगरों में रहने वाले सर्वसाधारण लोगों का पता चलता है। इन लोगों में धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहार, छोटे व्यापारी आदि होते थे।

प्रश्न 4. पांड् य सरदार (स्रोत 3) को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दन्गुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?

उत्तर: पांड् य सरदार को भेंट की गई वस्तुओंकी जानकारी हमें शिल्पादिकारम् में दिए वर्णन से प्राप्त होती है तथा दंगुन गाँव वह गाँव है जिसे प्रभावती गुप्त ने एक भिक्षु को भूमि अनुदान में दिया था। इस अनुदान पत्र से हमें गाँव में पैदा होने वाली वस्तुओं की जानकारी मिलती है। पांड् य सरदार को प्राप्त वस्तुओं व दंगुन गाँव की वस्तुओं की सूची निम्नलिखित प्रकार से है:

पहाड़ी लोग वाणिज्य के राजा के लिए हाथी दाँत, शहद, चंदन, सिंदूर के गोले, काजल, हल्दी, इलायची, काली मिर्च, कंद का आटा वगैरह भेंट लाए। उन्होंने राजा को बड़े नारियल, आम, दवाई में काम आने वाली हरी पत्तियों की मालाएँ, तरह-तरह के फल, प्याज, गन्ना, फूल, सुपारी के गुच्छे, पके केलों के गुच्छे, जानवरों व पक्षियों के बच्चे आदि का अर्पण किया। दंगुन गाँव की वस्तुओं में घास, जानवरों की खाल, कोयला, मदिरा, नमक, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल,दूध आदि सम्मिलित थे।

समानताएँ: दोनों सूचियों की वस्तुओं में बहुत कम समानता है। दोनों सूचियों में मात्र फूल का नाम पाया गया है। ऐसा लगता है कि पांड् य राजा भी उपहार मिलने.के बाद जानवरों की खाल का इस्तेमाल करते थे।

असमानताएँ: इन दोनों सूचियों में अधिकतर असमानताएँ ही दिखाई देती हैं। वस्तुएँ प्राप्त करने के तरीकों में भी बहुत असमानताएँ दिखती हैं। एक और जहाँ पांड् य सरदार को लोग ख़ुशी से नाच गाकर वस्तुएँ भेंट कर रहे हैं तो दूसरी और दंगुन गाँव के लोगों को दान प्राप्तकर्ता को ये वस्तुएँ देनी ही पड़ती थीं। अनुदान पत्र से स्पष्ट है कि ऐसे करने के लिए वे बाध्य थे।

प्रश्न 5. अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।

उत्तर: अभिलेखों के अध्ययनकर्त्ता तथा विश्लेषणकर्त्ता को अभिलेखशास्त्री कहते हैं। अपने कार्य के संपादन में अभिलेखशास्त्रियों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है:

अभिलेखशास्त्रियों को कभी-कभी तकनीकी सीमा का सामना करना पड़ता है। अक्षरों को हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है जिन्हें पढ़ पाना कठिन होता है। कभी-कभी अभिलेखों के कुछ भाग नष्ट हो जाते हैं। इससे अक्षर लोप हो जाते हैं जिस कारण शब्दों/वाक्यों का अर्थ समझ पाना कठिन हो जाता है। कई अभिलेख विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं, इससे भी हम वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते।

एक सीमा यह भी रहती है कि अभिलेखों में उनके उत्कीर्ण करवाने वाले के विचारों को बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त किया जाता है। अत: तत्कालीन सामान्य विचारों से इनका संबंध नहीं होता। फलत: कई बार ये जन-सामान्य के विचारों और कार्यकलापों पर प्रकाश नहीं डाल पाते। अत: स्पष्ट है कि सभी अभिलेख राजनीतिक और आर्थिक इतिहास की जानकारी प्रदान नहीं कर पाते।

अनेक अभिलेखों का अस्तित्व नष्ट हो गया है या अभी प्राप्त नहीं हुए हैं। अत: अब तक जो अभिलेख प्राप्त हुए हैं वे कुल अभिलेखों का एक अंश हैं। अभिलेखशास्त्रियों को अनेक सूचनाएँअभिलेखों पर नहीं मिल पातीं। विशेष तौर पर जनसामान्य से जुड़ी गतिविधियों पर अभिलेखों में बहुत कम या नहीं के बराबर लिखा गया है।

अभिलेखों में सदा उन्हीं के विचारों को व्यक्त किया जाता है जो उन्हें उत्कीर्ण करवाते हैं। ऐसे में अभिलेखशास्त्री को अत्यंत सावधानी तथा आलोचनात्मक अध्ययन से इनकी सूचनाओं को परखना जरूरी होता है।

प्रश्न 6. मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्त्वों के प्रमाण मिलते हैं?

उत्तर:- मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ-मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। इसी नगर से मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य को चारों दिशाओं में विस्तृत किया था। मौर्य साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर दक्षिण में सिद्धपुर तक, पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैला हुआ था। अशोक ने कलिंग (उड़ीसा) को जीतकर मौर्य साम्राज्य को और अधिक विस्तृत किया।

* 1. केंद्रीय शासन :-

सम्राट तथा उसके मंत्रियों द्वारा सीधे राजधानी से संचलित होने वाले शासन को केंद्रीय शासन कहते हैं। इस केंद्रीय शासन के अंतर्गत सम्राट के कार्य, मंत्रिपरिषद्, न्याय-व्यवस्था, सैनिक व्यवस्था, पुलिस, गुप्तचर तथा लोक-कल्याणकारी कार्यों आदि के प्रबंध का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है1. सम्राट-चंद्रगुप्त द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था पूर्णत: केंद्रीय शासन व्यवस्था थी। संपूर्ण साम्राज्य पर केंद्रीय शासन को नियंत्रण था। इस केंद्रीय शासन का प्रमुख सम्राट था जो सर्वशक्तिशाली एवं शासन का केंद्रबिंदु था। वही कानून बनाने की, उन्हें लागू करने की तथा न्याय करने की अंतिम शक्ति रखता था। वह स्वयं सेना के संगठन की व्यवस्था करता था तथा युद्ध में सेना का संचालन करता था।

अतः इस दृष्टि से वह स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक था। इतिहासकार स्मिथ का कहना है कि-“चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध से जो तथ्य प्रकट होते हैं, उनसे सिद्ध होता है कि वह कठोर निरंकुश शासक था।” किंतु चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध ने जो शक्तियाँ सम्राट को दी थीं, वे केवल सैद्धांतिक रूप से ही उसके पास थीं। वह उन शक्तियों को व्यवहार में लाने से पूर्व अपने मंत्रियों व परामर्शदाताओं से सलाह करता था। सम्राट पर परंपरागत कानूनों तथा नैतिक कानूनों को भी बंधन था। चाणक्य ने राजा के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन किया है और उसमें राजा को जनहित के कार्यों के लिए प्रेरित किया है। ऐसा न करने पर राजा अपनी प्रजा के ऋण से निवृत्त नहीं हो सकता। इस प्रकारे चंद्रगुप्त मौर्य को हम उदार निरंकुश शासक कह सकते हैं।

* 2. मंत्रिपरिषद् :-

कौटिल्य का विश्वास था कि सम्राट राज्य का एक पहिया है। राज्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए दूसरे पहिए मंत्रिपरिषद् की आवश्यकता होती है जो अति महत्त्वपूर्ण मामलों पर सम्राट को परामर्श दे सके। सम्राट मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को उनकी बुद्धिमत्ता तथा सच्चरित्रता देखकर नियुक्ति करता था। ये वेतनभोगी होते थे। मंत्रिपरिषद् के निर्णय सर्वमान्य होते थे किंतु राजा को विशेषाधिकार भी प्राप्त थे और वह उन निर्णयों को मानने के लिए बाध्य न था। ऐसा प्रतीत होता है कि अति महत्त्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेने के लिए ही मंत्रिपरिषद् की बैठक बुलाई जाती थी। दैनिक कार्यों के लिए मंत्रिपरिषद् की एक अंतरंग सभा जिसमें प्रधानमंत्री, पुरोहित, सेनापति आदि होते थे, की व्यवस्था की गई।.

* 3. न्याय व्यवस्था :-

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने विद्वान तथा कूटनीतिज्ञ महामंत्री चाणक्य के परामर्श से एक श्रेष्ठ न्याय व्यवस्था की स्थापना की थी। आज भी सभ्य संसार में उस न्याय व्यवस्था के मूल तत्वों का अनुकरण किया जा रहा है। संपूर्ण न्याय व्यवस्था का प्रधान न्यायाधीश सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं था। उसके नीचे अनेक छोटे-बड़े न्यायाधीश होते थे। नगरों व जनपदों के लिए अलग-अलग न्यायाधीशों की व्यवस्था थी। नगरों में न्यायाधीश ‘राजुक’ कहलाते थे। ग्रामों में पंचायतें भी छोटे-छोटे मुकदमों का फैसला करती थीं। न्यायालय दो प्रकार के होते थे-दीवानी (धन संबंधी) मुंकदमों का फैसला करने वाले न्यायालय ‘धर्मस्थीय’ कहलाते थे और फौजदारी मुकदमों का फैसला करने वाले न्यायालय ‘कण्टकशोधन’ कहलाते थे। निचले न्यायालयों के मुकदमों के फैसलों के विरुद्ध अपीलें बड़े न्यायालयों में सुनी जाती थीं। अपराधों को कम करने के लिए चंद्रगुप्त के काल में कठोर दंड दिए जाते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह प्रकार के दंड दिए जाते थे। जुर्माने, अंगभंग तथा मृत्युदंड का दंड साधारण रूप में दिया जाता था। कठोर दंड के कारण अपराध बहुत कम हो गए थे। लोग घरों में बिना ताला लगाए भी बाहर चले जाते थे।

* 4. सैनिक व्यवस्था :-

चंद्रगुप्त मौर्य ने चतुरंगिणी की व्यवस्था की थी अर्थात् उसकी सेना चार भागों में विभाजित थीं-पैदल, अश्वारोही, हाथी, रथ। इसके अतिरिक्त उसने जल सेना का भी गठन किया था। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त की सैनिक व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया है। उसके अनुसार उसकी सेना में छह लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार अश्वारोही, नौ हज़ार हाथी तथा आठ हजार रथ थे। इतनी विशाल सेना रखने का प्रमुख कारण चंद्रगुप्त की महत्त्वाकांक्षाएँ थीं। उसने अनेक छोटे राज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना सेना के आधार पर ही की थी। वास्तव में वह युग ‘सैनिक युग था और साम्राज्य का आधार सेना होती थी। चंद्रगुप्त ने इसी विशाल सेना के आधार पर यवनों को पराजित करके देश से बाहर खदेड़ा, नंदवंश का नाश किया और सुव्यवस्थित शासन के द्वारा शांति स्थापित की।

सम्राट प्रधान सेनापति होता था। वह युद्ध में सेना का संचालन भी करता था। चंद्रगुप्त इस विशाल सेना की व्यवस्था के लिए एक ‘युद्ध-परिषद्’ का गठन किया था जिसके तीस सदस्य थे। ये तीस सदस्य छह समितियों में विभाजित थे। इस प्रकार पाँच सदस्यों की प्रत्येक समिति सेना के एक भाग की व्यवस्था देखती थी। पहली समिति जल सेना का प्रबंध करती थी, दूसरी समिति सेना के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री तथा रसद का प्रबंध करती थी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं एवं छठी समितियाँ क्रमशः पैदल, अश्वारोही, हाथी तथा रथ सेना की व्यवस्था देखती थी। ये सेनाएँ स्थायी थीं। राज्यकोष से सैनिकों को वेतन मिलता था।

* 5. राजा के अधिकारियों के कार्य :-

मौर्य सम्राट के द्वारा नियुक्त विभिन्न अधिकारी विभिन्न कार्यों का निरीक्षण किया करते थे। साम्राज्य के अधिकारियों में से कुछ नदियों की देख-रेख और भूमिमापन का काम करते थे। कुछ प्रमुख नहरों से उपहारों के लिए छोड़े जाने वाले पानी के मुखद्वार का निरीक्षण करते थे ताकि हर स्थान पर पानी की समान पूर्ति हो सके। यही अधिकारी शिकारियों का संचालन करते थे और शिकारियों के कृत्यों के आधार पर उन्हें इनाम या दंड देते थे। वे कर वसूली करते थे और भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों का निरीक्षण करते थे। साथ ही लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का भी निरीक्षण करते थे।

अशोक के अभिलेखों में मौर्य प्रशासन के प्रमुख तत्त्व अशोक के अभिलेखों में हमें मौर्य प्रशासन के अनेक प्रमुख तत्वों की झलक मिलती है। अभिलेखों में हमें प्रशासन के प्रमुख केंद्रों, पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जैन, सुवर्णगिरि, तोशाली, कौशाम्बी आदि का बार-बार उल्लेख मिलता है। कलिंग अभिलेखों से पता चलता है कि तोशाली और उज्जैन के शासनाध्यक्षों को ‘कुमार’ कहा जाता था। ब्रह्मगिरि-सिद्धपुर अभिलेखों में । सुवर्णगिरि के शासनाध्यक्ष को ‘आर्यपुत्र’ कहा गया है।

अशोक के अभिलेखों में हमें महामात्रों और धर्म-महामात्रों का भी बार-बार उल्लेख मिलता है। महाशिलालेख V से पता चलता है कि सम्राट ने अपने राज्याभिषेक के तेरह वर्ष बाद महामात्रों की नियुक्ति प्रारंभ की थी। स्तंभ लेख VII में धर्म महामात्रों के कर्तव्यों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया है कि धम्म-महामात्रों को सभी वर्गों में धर्म का प्रचार करना चाहिए और धम्म का अनुसरण करने वालों की उन्नति की ओर ध्यान देना चाहिए। अशोक ने स्त्रियों की भलाई के लिए स्त्रीअध्यक्ष महामात्रों की नियुक्ति की थी। उनका उल्लेख भी अभिलेखों में मिलता है। जिला प्रशासन में नियुक्त राजुक तथा युक्त जैसे अधिकारियों का उल्लेख महाशिलालेख III और स्तंभ लेख I और IV में मिलता है। स्तंभ लेख IV से पता चलता है कि राजुक का प्रमुख कार्य जनपद के लोगों की भलाई के लिए करना था।

अशोक ने उन्हें लोगों को अच्छे कामों के लिए सम्मानित करने तथा बुरे कामों के लिए दंडित करने का अधिकार भी प्रदान कर दिया था। महाशिलालेख III से पता चलता है कि युक्त के कार्यों में मुख्य रूप से सचिव के कार्य सम्मिलित थे। राजस्व का संग्रह और उसका हिसाब रखना उसके कार्यों के अंतर्गत आता था। महाशिलालेख VI और अन्य शिलालेखों में भी प्रतिवेदकों का उल्लेख मिलता है। प्रतिवेदक सम्राट अथवा केंद्रीय सरकार के प्रमुख संवाददाता होते थे। उनकी पहुँच सीधे सम्राट तक थी। महाशिलालेख VI से पता चलता है कि सम्राट अशोक को सदा प्रजाहिंत की चिंता रहती थी। इसमें कहा गया है- राजन् देवानांपिय पियदस्सी यह कहते हैं; अतीत में मसलों को निपटाने और नियमित रूप से सूचना एकत्र करने की व्यवस्थाएँ नहीं थीं। किन्तु मैंने व्यवस्था की है कि लोगों के समाचार हम तक प्रतिवेदक सदैव पहुँचाए।

चाहे मैं कहीं भी हूँ, खाना खा रहा हूँ, अन्त:पुर में हूँ, विश्राम कक्ष में हूँ, गोशाले में हूँ या फिर पालकी में मुझे ले जाया जा रहा हो अथवा वाटिका में हूँ। मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूंगा।” इसी प्रकार धर्मसहनशीलता जो मौर्य प्रशासन का एक प्रमुख अभिलक्षण था, का उल्लेख भी हमें अशोक के शिलालेखों में मिलता है। महाशिलालेख XII में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मनुष्य को अपने धर्म का आदर करना चाहिए, किन्तु दूसरे धर्मों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। नि:संदेह, मौर्य साम्राज्य का भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह साम्राज्य भारत भूमि पर स्थापित साम्राज्यों में सबसे पहला और सर्वाधिक विशाल साम्राज्य था। इसे साम्राज्य की स्थापना के साथ ही भारतीय इतिहास अंधकार से प्रकाश के युग में प्रवेश करता है।

प्रश्न 7. यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी०सी० सरकार का वक्तव्य है-भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिनका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है : चर्चा कीजिए।

उत्तर:- पत्थर, धातु अथवा मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे हुए लेखों को अभिलेख के नाम से जाना जाता है। अभिलेख अथवा उत्कीर्ण लेख पुरातात्विक साधनों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन हैं। अभिलेख प्रस्तर स्तूपों, शिलाओं, मंदिरों की दीवारों, ईंटों, मूर्तियों, ताम्रपत्रों और मुहरों आदि पर मिलते हैं। अभिलेखों में उनके निर्माताओं की उपलब्धियों, क्रियाकलापों अथवा विचारों का उल्लेख होता है। इनमें राजाओं के क्रियाकलापों एवं स्त्री-पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का विवरण होता है। अभिलेख एक प्रकार के स्थायी प्रमाण होते हैं। इनमें साहित्य के समान हेर-फेर नहीं किया जा सकता। अतः इस दृष्टि से अभिलेखों का महत्त्व और भी

अधिक बढ़ जाता है। अनेक अभिलेखों में उनके निर्माण की तिथियाँ भी उत्कीर्ण हैं। जिन पर तिथि नहीं मिलती, उनका काल निर्धारण सामान्यत: पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर किया जाता है। अभिलेखों में मौर्य सम्राट अशोक के स्तम्भ लेख तथा शिलालेख सर्वाधिक प्राचीन एवं अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ये अभिलेख उसके विशाल साम्राज्य के सभी भागों से प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक के अभिलेख चार लिपियों में मिलते हैं। अफगानिस्तान के शिलालेखों में अरामाइक और यूनानी लिपियों का प्रयोग किया गया है। पाकिस्तान क्षेत्र के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं। उत्तर में उत्तराखंड में कलसी से लेकर दक्षिण में मैसूर तक फैले अशोक के शेष साम्राज्य के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं।

अशोक के अभिलेख उसके शासनकाल के विभिन्न वर्षों में उत्कीर्ण किए गए थे। उन्हें राज्यादेश अथवा शासनादेश कहा जाता है, क्योंकि वे राजा की इच्छा अथवा आदेशों के रूप में प्रजा के लिए प्रस्तुत किए गए थे। नि:संदेह अभिलेख प्राचीन इतिहास के पुनर्निर्माण में हमारी महत्त्वपूर्ण सहायता करते हैं। चट्टानों अथवा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के प्राप्ति स्थानों से संबंधित शासक के राज्य की सीमाओं का भी अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए अशोक के अभिलेखों के प्राप्ति स्थानों से उसके राज्यविस्तार पर प्रकाश पड़ता है। अशोक के बाद के अभिलेखों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-सरकारी अभिलेख और निजी अभिलेख। सरकारी अभिलेख या तो राजकवियों की लिखी हुई प्रशस्तियाँ हैं या भूमि अनुदान-पत्र। प्रशस्तियों में राजाओं और विजेताओं के गुणों राजा, किसान और नगर के और कीर्तियों का वर्णन किया गया है।

प्रशस्तियों का प्रसिद्ध उदाहरण-समुद्रगुप्त का प्रयोग अभिलेख है, जो अशोक स्तम्भ पर उत्कीर्ण है। इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विजयों और नीतियों का पूर्ण विवरण उपलब्ध होता है। गुप्तकाल के अधिकांश अभिलेखों में वंशावलियों का वर्णन है। इसी प्रकार राजा भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में उसकी उपलब्धियों का वर्णन है। कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, रुद्रदामा का गिरनार शिलालेख, स्कंदगुप्त का भीतरी स्तंभ लेख, बंगाल के शासक विजय सेन का देवपाड़ा अभिलेख और चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख इस प्रकार के अभिलेखों के अन्य उदाहरण हैं। भूमि अनुदान-पत्र अधिकतर ताम्रपत्रों पर उकेरे गए हैं। इनमें ब्राह्मणों, भिक्षुओं, जागीरदारों, अधिकारियों, मंदिरों और विहारों आदि को दिए गए गाँवों, भूमियों और राजस्व के दानों का उल्लेख है।

ये प्राकृत, संस्कृत, तमिल, तेलुगु आदि विभिन्न भाषाओं में लिखे गए हैं। निजी अभिलेख अधिकांशतः मंदिरों में या मूर्तियों पर उत्कीर्ण हैं। इन पर खुदी तिथियों से इन मंदिरों के निर्माण एवं मूर्ति प्रतिष्ठापन के समय का पता लगता है। ये अभिलेख तत्कालीन धार्मिक दशा, मूर्तिकला, वास्तुकला एवं भाषाओं के विकास पर भी प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के लिए, गुप्तकाल से पहले के अधिकांश अभिलेखों की भाषा प्राकृत है और उनमें बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का उल्लेख है। गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल के अधिकांश अभिलेखों में ब्राह्मण धर्म का उल्लेख है और उनकी भाषा संस्कृत है। निजी अभिलेख तत्कालीन राजनैतिक दशा पर भी पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। अतः बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी०सी० सरकार के शब्दों में यह कहना उचित ही होगा कि-” भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिम्ब अभिलेखों में नहीं है।”

प्रश्न 8. उत्तर मौर्यकाल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।

उत्तर :- * उत्तर मौर्यकाल में राजधर्म के विचार :-

1. उत्तर मौर्यकाल में राजाओं ने अपने अस्तित्व को ऊँचा बनाए रखने के लिए अपने अपको देवी-देवताओं से जोड़ लिया। मध्य एशिया से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक शासन करने वाले कुषाण शासकों ने (लगभग प्रथम शताब्दी ई०पू० से प्रथम शताब्दी ई० तक) इस उपाय का सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया।

2. जिस प्रकार के राजधर्म को कुषाण शासकों ने प्रस्तुत करने के इच्छा की, उसका सर्वोत्तम प्रमाण उनके सिक्कों और मूर्तियों से प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश में मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं। अफगानिस्तान के एक देवस्थान पर भी इसी प्रकार की मूर्तियाँ मिली हैं।

3. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इन मूर्तियों के जरिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे। कई कुषाण शासकों ने अपने नाम के आगे ‘देवपुत्र’ की उपाधि भी लगाई थी। संभवतः वे उन चीनी शासकों से प्रेरित हुए होंगे, जो स्वयं को ‘स्वर्गपुत्र’ कहते थे।

4. चौथी शताब्दी ई० में गुप्त साम्राज्य सहित कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे। अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों द्वारा करते थे। जिसमें भूमि पर नियंत्रण भी शामिल था। वे शासकों का आदर करते थे और उनकी सैनिक सहायता भी करते थे। जो सामंत शक्तिशाली होते थे वे राजा भी बन जाते थे और जो राजा दुर्बल होते थे, वे बड़े शासकों के अधीन हो जाते थे।

5. गुप्त शासकों का इतिहास साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों की सहायता से लिखा गया है। साथ ही कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी प्रशस्तियाँ भी उपयोगी रही हैं। यद्यपि इतिहासकार इन रचनाओं के आधार पर ऐतिहासिक तथ्य निकालने का प्रायः प्रयास करते हैं, लेकिन उनके रचयिता तथ्यात्मक विवरण की अपेक्षा उन्हें काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे। उदाहरण के तौर पर इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख के नाम से प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति की रचना हरिषेण जो स्वयं गुप्त सम्राटों के संभवतः सबसे शक्तिशाली सम्राट समुद्रगुप्त के राजकवि थे, ने संस्कृत में की थी।

प्रश्न 9.वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?

उत्तर:-* वर्णित काल में कृषि के क्षेत्र में आए परिवर्तन :-

1. करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए। उपज बढ़ाने का एक तरीका हल का प्रचलन था। जो छठी शताब्दी ई०पू० से ही गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में फैल गया था। जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी, वहाँ लोहे के फाल वाले हलों के माध्यम से उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी। इसके अलावा गंगा की घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृद्धि होने लगी।

* 2. यद्यपि लोहे के फाल वाले हल की वजह से फसलों की उपज बढ़ने लगी, लेकिन ऐसे हलों का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में सीमित था। पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क जमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ। जो किसान उपमहाद्वीप के पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे उन्होंने खेती के लिए कुदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अधिक उपयोगी था।

* 3. उपज बढ़ाने का एक और तरीका कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से सिंचाई करना था। कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन निर्मित किए। व्यक्तिगत तौर पर तालाबों, कुओं और नहरों जैसे सिंचाई साधन निर्मित करने वाले लोग प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे, जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया।

* 4. यद्यपि खेती की इन नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी, लेकिन इसके लाभ समान नहीं थे। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद बढ़ता जा रहा था। कहानियों में विशेषकर बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े जमींदारों का उल्लेख मिलता है। पालि भाषा में गहपति का प्रयोग छोटे किसानों और जमीदारों के लिए किया जाता था। बड़े-बड़े जमींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली माने जाते थे, जो प्रायः किसानों पर नियंत्रण रखते थे। ग्राम प्रधान का पद प्रायः वंशानुगत होता था। |

* 5. आरंभिक तमिल संगम साहित्य में भी गाँवों में रहने वाले विभिन्न वर्गों के लोगों; जैसे-बड़े जमींदारों, हलवाहों और दासों का उल्लेख मिलता है। बड़े जमींदारों को ‘वेल्लार’, हलवाहों को ‘उझावर’ तथा दासों को ‘आदिमई’ कहा जाता था। यह संभव है कि वर्गों की इस विभिन्नता का कारण भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित हो। ऐसी परिस्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया। जिनकी चर्चा विधि ग्रंथों में प्रायः की जाती थी।

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