Class 12 History Chapter 3 बंधुत्व जाति और वर्ग – आरंभिक समाज

Class 12 History Chapter 3

3) बंधुत्व जाति और वर्ग – आरंभिक समाज. (लगभग 600 ई.. से 600 ई)

स्मरणीय बिन्दु;-

1. समकालीन समाज को समझने के लिए इतिहासकार प्रायः साहित्यिक परम्पराओं व अभिलेखों का उपयोग करते हैं।

2. यदि इन ग्रंथों का प्रयोग सावधानी से किया जाए तो समाज में प्रचलित आचार-व्यवहार और रिवाजों का इतिहास लिखा जा सकता है।

3. उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध ग्रंथों में से एक महाभारत’ जैसे विशाल महाकाव्य के विश्लेषण में उस समय की सामाजिक श्रेणियों तथा आचार-व्यवहार के मानदंडों को जानने का प्रयास।

4. 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी. एस. सुकथांकर के नेतृत्व में महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने की शुरूआत हुई। इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे।

5. महाभारत की मूल कथा के रचियता संभवतः भाट सारथी थे जिन्हें सूत कहा जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे। साहित्यिक परंपरा के अनुसार इस वृहत रचना के रचयिता ऋषि व्यास थे जिन्होंने श्री गणेश से यह ग्रंथ लिखवाया।

6. धर्म शास्त्रों व धर्मसूत्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका

7. पितृवंशिकता का अर्थ उस वंश परंपरा से है जो पिता के बाद पुत्र फिर पौत्र प्रपौत्र आदि से चलती है। महाभारत की मुख्य कथा वस्तु, पितृवंशिकता के आदर्श को सुदृढ़ करती है। अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे।

8. नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन-अधिक जटिल हुआ। इस चुनौती का जवाब ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिता तैयार करके दिया जैसे – धर्मशास्त्रमनु स्मृति आदि।

9, ब्राह्मणीय पद्धति में लोगों को गोत्रों में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।

10. गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर

पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।

11, ‘जाति’ शब्द इस काल की सामाजिक जटिलताएँ दर्शाता है। ब्राह्मणीय सिद्धांत में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी।

12. उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली कुछ विविधताओं की वजह से कुछ समुदायों जैसे – निषादमलेच्छ आदि पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

13. ब्राह्मणों ने समाज में कुछ वर्गों को अस्पृश्य’ घोषित कर (जैसे चाण्डाल) सामाजिक वैमनस्य को और अधिक प्रखर बनाया।

14. मनु स्मृति में चाण्डालों के कर्तव्यों की सूची मिलती है।

15. मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रों में समान रूप से बंटवारा किया जाना चाहिए किन्तु ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग का अधिकार था।

16. धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र विवाह के आठ प्रकारों को अपनी स्वीकृति देते हैं। इनमें से पहले चार उत्तम माने जाते थे और बाकियों को निंदित माना गया।

17. ब्राह्मणीय सिद्धांत में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी, किंतु वर्ण जहाँ मात्र चार थे वहीं जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। वस्ततः जहाँ कहीं भी ब्राह्मणीय व्यवस्था का नए समुदायों से आमना-सामना हुआ, यथा निषाद, सुवर्णकार और उन्हें चार वर्गों वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था, उनका जाति में वर्गीकरण कर दिया गया।

18 . ब्राह्मणीय वर्ण-व्यवस्था की आलोचनाएँ प्रारम्भिक बौद्ध धर्म में विकसित हुई। बौद्ध धर्म ने सामाजिक विषमता की उपस्थिति को स्वीकार किया किंतु यह भेद न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी । बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।

19. नए नगरों के उदभव से सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ। नगरीय परिवेश में विचारों का भी आदान-प्रदान होता था। संभवतः इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्नचिन्ह लगाए गए।

20. स्त्रियाँ पैतृक संसाधन में हिस्सेदारी की माँग नहीं कर सकती थी परन्तु स्त्रीधन पर उनका स्वामित्व माना जाता था।

21. इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय अनेक पहलुओं पर विचार करते हैं जैसे ग्रंथ की भाषा, काल, प्रकार, ग्रंथ किसने लिखा, क्या लिखा गया और किनके लिए लिखा गया।

22. महाभारत एक गतिशील ग्रंथ है, क्योंकि शताब्दियों तक इस महाकाव्य में अनेक

पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, क्षेत्र विशेष की कहानियाँ इसमें समाहित कर ली गयी । इसकी अनेक पुनव्र्याख्याएँ की गई। इस महाकाव्य ने मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला व नाटकों के लिए विषय-वस्तु प्रदान की।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक वाले)

प्रश्न 1. महाभारत की कथा वस्तु का संबंध किससे है ?

उत्तर (संकेत-दो परिवारों के बीच युघ्द)

प्रश्न 3. मनुस्मृति क्या थी ? इसका संकलन कब हुआ ?

उत्तर (संकेत-धर्मशास्त्रों और धर्मसूत्रों में सबसे बड़ा ग्रंथ, संकलन 200 ई. पू. से 200 ई. के बीच)

प्रश्न 4. पितृवंशिकता और मातृवंशिकता शब्दों का अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर (संकेत-पिता की प्रधानता, माता की प्रधानता)

प्रश्न 5 . विवाह संबंधी “बहुविवाह पद्धति” का क्या अर्थ है ?

उत्तर (संकेत-गोत्र से बाहर विवाह संबंध)

प्रश्न 7. ब्राह्मणीय पद्धति के अनुसार गोत्र संबंधी दो नियम लिखिए।

उत्तर (संकेत-प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर, उस गोत्र के सदस्य उसी ऋषि के वंशज माने जाते थे।

प्रश्न8. धर्म शास्त्रों के अनुसार स्त्रीधन किसे कहा गया ?

उत्तर (संकेत-विवाह के अवसर पर माता-पिता व स्वजनों द्वारा दिए गए उपहार स्वरूप धन सम्पत्ति)

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्त्वपूर्ण रही होगी?

उत्तर: पितृवंशकिता का अर्थ है-वह वंश-परंपरा जो पिता के बाद पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि से चलती है। इतिहासकार परिवार | और बंधुता संबंधी विचारों का विश्लेषण करते हैं। इसका अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उनकी सोच का पता चलता है। संभवतः इन विचारों ने लोगों के क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा। इसी तरह व्यवहार से विचारों में बदलाव आया होगा, हमें इस बात को स्पष्ट संकेत ऋग्वेद जैसे कर्मकांडीय ग्रंथ से भी मिलता है। विशिष्ट परिवारों में वस्तुतः शासक परिवार एवं संपन्न परिवार शामिल थे। ऐसे परिवारों की पितृवंशिकता निम्नलिखित दो कारणों से महत्त्वपूर्ण रही होगी

वंश-परंपरा को नियमित रखने हेतु-

धर्मसुत्रों की माने तो वंश को पुत्र ही आगे बढ़ाते हैं। अतः सभी परिवारों की कामना पुत्र प्राप्ति की थी। यह तथ्य ऋग्वेद के मंत्रों से स्पष्ट हो जाता है। इसमें पिता अपनी पुत्री के विवाह के समय इंद्र से उसके लिए पुत्र की कामना करता है।

उत्तराधिकार संबंधी विवाद से बचने हेतु:- विशिष्ट परिवारों के माता-पिता नहीं चाहते थे कि उनके बाद उत्तराधिकार को लेकर किसी प्रकार का झगड़ा हो। राज परिवारों में तो उत्तराधिकार के रूप में राजगद्दी भी शामिल थी। अतः पुत्र न होने पर अनावश्यक विवाद होता था।

प्रश्न 2. क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।

उत्तर: आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही नहीं होते थे बल्कि अन्य वर्गों से भी संबंधित होते थे। देश के अंदर शुरू से ही वर्ण-व्यवस्था जटिल थी और चारों वर्षों के लिए अलग-अलग कर्तव्य निर्धारित थे। उसके अनुसार राज्य करने का अधिकार केवल क्षत्रिय वर्ग के लोगों को ही था, धर्मसूत्रों और धर्मशस्त्रों में इसे एक आदर्श व्यवस्था के रूप में उल्लेख किया गया है। क्षत्रियों का कर्म शासन करना, युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, यज्ञ करवाना, वेद पढ़ना और दान-दक्षिणा देना था। ब्राह्मण भी इस व्यवस्था से संतुष्ट थे, क्योंकि उन्हें सामाजिक ढाँचे में पहला स्थान प्राप्त था और वे वर्ण-व्यवस्था को दैवीय व्यवस्था मानते थे। यह भी सत्य है कि ग्रंथों में गैर-क्षत्रिय राजा होने के प्रमाण मिलते हैं। कई महत्त्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्गों से हुई थी। मौर्य जिन्होंने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया, के उद्भव को लेकर गर्मजोशी से बहस होती रही है। बाद के बौद्ध ग्रंथों में यह इंगित किया गया है कि वे क्षत्रिय थे, किंतु ब्राहमणीय शास्त्र उन्हें निम्न कुल का मानते हैं।

शुंग और कण्व जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे ब्राह्मण थे। वस्तुतः राजनीतिक सत्ता का उपभोग हर वह व्यक्ति कर सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके। एक और बात है यह कि सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकानि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। उसने यह भी दावा किया कि चारों वर्गों के भीतर विवाह संबंध होने पर उसने रोक लगाई, किंतु फिर भी रुद्रदामन के परिवार से उसने विवाह संबंध स्थापित किए। जाति प्रथा के भीतर आत्मसात् होना बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी। सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का बताते थे, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए। वे वर्ण-व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखने का दावा करते थे, किंतु साथ ही उन लोगों से वैवाहिक संबंध भी स्थापित करते थे।

प्रश्न 3. द्रोण, हिडिंबा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए वे अपने उत्तर को भी स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 1. द्रोण की कथा और धार्मिक मानदंड- द्रोण के पास एकलव्य नामक वनवासी निषाद (शिकारी समुदाय) आया। द्रोण, जो धर्म समझते थे, उसके अनुसार उन्होंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया। एकलव्य ने वन में लौटकर मिट्टी से द्रोण की प्रतिमा बनाई और उसे अपना गुरु मानकर वह स्वयं ही तीर चलाने का अभ्यास करने लगा। समय के साथ वह तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया। बहुत दिन बाद एक दिन कुरु राजकुमार अपने कुत्ते के साथ जंगल में शिकार करते हुए एकलव्य के समीप पहुँच गए। कुत्ता काले मृग की चमड़ी के वस्त्र में लिपटे निषाद को देखकर भौंकने लगा।

एकलव्य ने एक साथ सात तीर चलाकर उसका मुँह बंद कर दिया। जब वह कुत्ता लौटा तो पांडव तीरंदाजी का यह अद्भुत द्रोण ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के सामने यह प्रण किया था कि उसे वे विश्व के अद्वितीय तीरंदाज बनाएँगे। इस दृश्य को देखकर अर्जुन ने द्रोण को उनका प्रण याद दिलाया। द्रोण एकलव्य के पास गए।

उसने उन्हें अपना गुरु मानकर प्रणाम किया। तब द्रोण ने गुरुदक्षिणा के रूप में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने फौरन गुरु को अपना अँगूठा काट कर दे दिया। अब एकलव्य तीर चलाने में उतना तेज़ नहीं रहा, इस तरह द्रोण ने अर्जुन को दिए वचन को निभाया। कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा। हालाँकि गुरु को ऐसा नहीं करना चाहिए। टिप्पणी-उपर्युक्त कथा से दो बातें स्पष्ट हैं कि द्रोण एक ब्राह्मण थे। उनका काम शिक्षा देना था और वर्ण-व्यवस्था के अनुसार सैनिक दायित्व का निर्वाह क्षत्रिय ही करते थे। द्रोण के शिष्य पांडव और कौरव क्षत्रिय थे। वे उन्हें धर्मसूत्र या वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित धर्म का अनुसरण करते हुए धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे। दूसरी बात इस कहानी के द्वारा निषादों को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे वनवासी आदिवासी हैं। अतः वे वर्ण-व्यवस्था के अनुसार उच्च वर्गों की बराबरी का दावा नहीं कर सकते।

2. हिडिंबा की कथा और धार्मिक मानदंड-

पांडव गहन वन में चले गए थे। थककर वे सो गए। केवल वितीय पांडव भीम जो अपने बल के लिए प्रसिद्ध थे, रखवाली कर रहे थे। एक नरभक्षी राक्षस को पांडवों की मानुष गंध ने विचलित किया और उसने अपनी बहन हिडिंबा को उन्हें पकड़कर लाने के लिए भेजा। हिडिंबा भीम को देखकर मोहित हो गई और एक सुंदर स्त्री के वेष में उसने भीम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इस बीच राक्षस वहाँ आ गया और उसने भीम को युद्ध के लिए ललकारा। भीम ने उसकी चुनौती को स्वीकार किया और उसका वध कर दिया। शोर सुनकर अन्य पांडव जाग गए। हिडिंबा ने उन्हें अपना परिचय दिया और भीम के प्रति अपने प्रेम से उन्हें अवगत कराया। वह कुंती से बोली-“हे उत्तम देवी, मैंने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है।

और आपके बाघ सदृश पुत्र का अपने पति के रूप में चयन किया है…चाहे आप मुझे मूर्ख समझे अथवा अपनी समर्पित दासी, कृपया मुझे अपने साथ लें, तथा आपका पुत्र मेरा पति हो।” अंततः युधिष्ठिर इस शर्त पर विवाह के लिए तैयार हो गए कि भीम दिनभर हिडिंबा के साथ रहकर रात्रि में उनके पास आ जाएँगे। दोनों का विवाह संपन्न हुआ। हिडिंबा ने एक राक्षस पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम घटोत्कच रखा गया। तत्पश्चात् माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए किंतु घटोत्कच ने यह प्रण किया कि जब भी पांडवों को उसकी जरूरत होगी वह उपस्थित हो जाएगा। टिप्पणी-कुछ इतिहासकारों का यह मत है कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार उन मानदंडों से भिन्न थे जिनका चित्रण ब्राहमणीय ग्रंथों में हुआ था।

3. मातंग की कथा और धार्मिक मानदंड-

एक बार बोधिसत्व ने बनारस नगर के बाहर एक चांडाल के पुत्र के रूप में जन्म लिया, उनका नाम मातंग था। एक दिन वे किसी कार्यवश नगर में गए और वहाँ उनकी मुलाकात दिथ्थ मांगलिक नामक एक व्यापारी की पुत्री से हुई। उन्हें देखकर वह चिल्लाई, “मैंने कुछ अशुभ देख लिया है।” यह कहकर उसने अपनी आँखें धोईं। उसके क्रोधित सेवकों ने मातंग की पिटाई की। विरोध में मातंग व्यापारी के घर के दरवाजे के बाहर जाकर लेट गए। सातवें रोज घर के लोगों ने बाहर आकर दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया। दिथ्थ उपवास से क्षीण हुए मातंग को लेकर चांडाल बस्ती में आई। घर लौटने पर मातंग ने संसार त्यागने का निर्णय लिया। अलौकिक शक्ति हासिल करने के उपरांत वह बनारस लौटे और उन्होंने दिथ्थ से विवाह कर लिया। माण्डव्यकुमार नामक उनका एक पुत्र हुआ।

बड़े होने पर उसने तीन वेदों का अध्ययन किया तथा प्रत्येक दिन वह 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था। एक दिन फटे वस्त्र पहने तथा मिट्टी का भिक्षापात्र हाथ में लिए मातंग अपने पुत्र के दरवाजे पर आये और उन्होंने भोजन माँगा। उन्हें देखकर माण्डव्य ने कहा कि तुम देखने से एक पतित प्रतीत होते हो, अतः तुम भिक्षा के यीग्य नहीं हो। भोजन ब्राह्मणों के लिए है। मातंग ने उत्तर दिया, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।” माण्डव्य ने क्रोधित होकर अपने सेवकों से मातंग को घर से बाहर निकालने को कहा। मातंग आकाश में जाकर अदृश्य हो गए। जब दिथ्थ मांगलिक को इस प्रसंग के बारे में पता चला तो वह उनसे माफी माँगने के लिए उनके पीछे आई। टिप्पणी-उपर्युक्त कथा से यह पता चलता है कि लोग महान धार्मिक संत या भिक्षु को भी उसके निम्न वर्ण या जाति से संबंधित होने के कारण उसके साथ घृणा और तिरस्कार का व्यवहार करते थे। हालाँकि बोधिसत्व मातंग की अलौकिक शक्ति को देखने के बाद विशिष्ट परिजन उनसे क्षमायाचना करते हैं।

प्रश्न 4. किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज में उस, ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था?

उत्तर: बौद्धों के अनुसार भारतीय समाज में विषमता मौजूद थी, लेकिन यह भेद न तो नैसर्गिक है और न ही स्थायी है। जो जन्म के आधार पर ब्राह्मण अपने अनेक सूक्तों जैसे ‘पुरुषसूक्त’ में उल्लेख करते हैं, उसे बौद्ध अवधारणा सिरे से खारिज करती है। सामाजिक अनुबंध के बारे में बौद्धों ने समाज में फैली विषमताओं के संदर्भ में एक अलग अवधारणा प्रस्तुत की। साथ ही समाज में फैले अंतर्विरोधों को नियमित करने के लिए जिन संस्थानों की आवश्यकता थी, उस पर भी अपना दृष्टिकोण सामने रखा।

सूत्तपिटक नामक ग्रंथ में एक मिथक वर्णित है-“वनस्पति जगत् भी अविकसित था। सभी जीव शांति के एक निर्बाध लोक में रहते थे और प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे जितनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती है। किंतु यह व्यवस्था क्रमशः पतनशील हुई। मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए। ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की सेवा के बदले उसे देते थे।” यह मिथक इस बात को भी दर्शाता है कि आर्थिक और सामाजिक संबंधों को बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था। इस तथ्य के कुछ और आशय भी हैं। उदाहरणत: यदि मनुष्य स्वयं एक प्रणाली को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे तो भविष्य में उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।

प्रश्न 5. निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं

“संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य का चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा ( धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ…मैं उन सब कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं… सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनको जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं…मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पलियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”…मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा…सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध , विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा….” ।

इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए-उम्र, लिंग-भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार भी हैं? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?

उत्तर:- इस सूची में जिन आधारों को इसके निर्माण हेतु मान्यता दी गई है, उनकी पहचान करते हुए हम कह सकते हैं कि उम्र, | लिंग-भेद, बंधुत्व के संदर्भ के साथ-साथ गुरु-शिष्य के संबंध राजा के प्रति सम्मान, माताओं के प्रति अभिनंदन विशेष रूप से ध्यान में रखे गए हैं।

1. इस सूची में सर्वप्रथम युधिष्ठिर ने कौरवों के दूत संजय को संबोधित करते हुए अपने राज्य के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को अपना विनीत अभिवादन प्रस्तुत किया। वस्तुतः महाकाव्य काल में भी क्षत्रिय पूरे ब्राह्मण वर्ण का अभिनंदन या सम्मान करते थे, क्योंकि उन्हें समाज में उनकी विद्वता, ज्ञान आदि के लिए सर्वोच्च स्थान, सामाजिक ढाँचे में केवल दिखाने के लिए नहीं बल्कि व्यावहारिक ढाँचे में भी प्राप्त था।

2. ब्राह्मणों के उपरांत युधिष्ठिर ने गुरु द्रोण के प्रति हृदय से नतमस्तक होकर अपने सम्मान की अभिव्यक्ति की। वे द्रोण की तरह कृपाचार्य को भी गुरु मानते थे।

3. तत्पश्चात उन्होंने कुरुओं के प्रधान और उम्र में सबसे बड़े भीष्म पितामह को सम्मान दिया क्योंकि वे अपनी योग्यता के साथ-साथ उम्र और अनुभव की दृष्टि से भी सम्माननीय थे।

4. यद्यपि धृतराष्ट्र कौरवों के पिता थे लेकिन उन्हें भी युधिष्ठिर ने सम्मान दिया, क्योंकि वे वृद्ध होने के साथ-साथ हस्तिनापुर के नरेश भी थे।

5. युधिष्ठिर मर्यादा पुरुषोत्तमों में से एक थे। इंसानियत उनके व्यवहार और विचारों से अभिव्यक्त होती है। यद्यपि साहित्यकारों ने दुर्योधन को एक अच्छे पात्र के रूप में उपस्थित नहीं किया है, तथापि युधिष्ठिर ने दुर्योधन और उसके अनेक छोटे भाइयों के बारे में राजपूत संजय से पूछकर शिष्टाचार का निर्वाह किया और अपनी शुभकामनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं। निस्संदेह यह शिष्टाचार का तकाजा है।

6. उस काल में एक वीर दूसरे वीर या योद्धा का सम्मान करता था। फलतः संजय से युधिष्ठिर ने कहा, “मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिवादन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं।”

7. युधिष्ठिर सम्मान का अगला आधार बौधिक स्तर को बनाते हैं। विदुर विद्वानों में सर्वोपरि थे। निस्संदेह उनका जन्म एक दासी की कोख से हुआ था लेकिन युधिष्ठिर जन्म के आधार पर आधारित वर्ण-व्यवस्था में यकीन नहीं रखते थे। अतः उन्होंने बौद्धिक स्तर के आधार पर विदुर को नमन किया और उन्हें अपने पिता और माता के समान सहृदय बताया।

8. तत्पश्चात् युधिष्ठिर ने संजय से स्त्रियों, विशेषकर वृद्धा और अपनी माता की उम्र की नारियों के प्रति अपना नमस्कार व सम्मान देने के लिए कहा। यह इस बात का प्रतीक है कि उस समय के लोग नारियों का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने शीघ्र ही अपने छोटे भाइयों, पुत्रों, पौत्रों आदि की पत्नियों के लिए उम्मीद जताई है कि वह पूर्णतया सुरक्षित होंगी। उन्होंने कुलवधुओं को जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं उनको शुभकामनाएँ देने के लिए भी कहा।

9. यही नहीं, एक अन्य आधार पर युधिष्ठिर ने कुरु राज्य को सुंदर, सुगंधित और अच्छे वस्त्र पहनने वाली गायिकाओं को भी शुभकामनाएँ दीं। और अंत में वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को उन्होंने नमस्कार कहा। यद्यपि वे सभी सामाजिक अनुक्रम में सबसे नीचे हैं, लेकिन उन्हें न भुलाकर युधिष्ठिर ने एक बार पुनः अपनी महानता और शिष्ट व्यवहार का परिचय दिया। हमारे विचार से व्यापारी, सौदागर, कृषक, भूमिहीन मज़दूर और सेवक-सेविकाओं को भी सम्मान मिलना चाहिए। क्योंकि तथाकथित तीसरे और चौथे वर्ण के लोग भी समाज के लिए बहुत ही उपयोगी और मेहनत के कार्य करते थे।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि : “चूंकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है…बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं…(वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।” चर्चा कीजिए।

उत्तर: महाभारत प्राचीन भारत का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है। आज भी भारतीय जन-जीवन पर इसका अगाध प्रभाव है। तत्कालीन जन-जीनव के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं का सजीव चित्रण इस महाकाव्य में किया गया है। भारतीय साहित्य के सुप्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा था, “चूंकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है… बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं… यह हमें भारतीय जनसामान्य की आत्मा की अगाध गहराई का दिग्दर्शन कराता है।” उल्लेखनीय है कि महाभारत काल तक आर्यों का संपूर्ण भारत में विस्तार हो चुका था। सभी स्थानों पर आर्यों के विभिन्न कुल राज्य कर रहे थे। कौरवों और पांडवों का संघर्ष धर्म और अधर्म का, औचित्य और अनौचित्य को संघर्ष है। पांडव धर्म और औचित्य के तथा कौरव अधर्म एवं अनौचित्य के प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण, जिन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है, इसी कारण पांडवों का समर्थन करते हैं।

इस संघर्ष में पांडवों की कौरवों पर विजय वास्तव में धर्म की अधर्म पर विजय है। धर्म और अधर्म के इस संघर्ष में विभिन्न पात्रों एवं कथानकों के माध्यम से भारतीय जनमानस को धर्म के मार्ग की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया गया है। इसीलिए तो गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को पांडवों से युद्ध न करने की सलाह देते हुए कहती है, “शांति की संधि करके तुम अपने पिता, मेरा और अपने शुभेच्छुकों का सम्मान करोगे…। विवेकी पुरुष जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है वही अपने राज्य की रखवाली करती है। लालच एवं क्रोध मनुष्य को लाभ से दूर खदेड़ ले जाते हैं। इन दोनों शत्रुओं को पराजित कर राजा संपूर्ण पृथ्वी को जीत सकता है… हे पुत्र, तुम विवेकी और वीर पांडवों के साथ सानंद इस पृथ्वी का भोग करोगे… युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता। न धर्म और अर्थ की प्राप्ति होती है और न ही प्रसन्नता की। युद्ध के अंत में सफलता मिले यह भी निश्चित नहीं… अपने मन को युद्ध में लिप्त मत करो।” इतिहास साक्षी है कि दुर्योधन ने अपनी माता की सलाह की उपेक्षा की और भाग्य ने उसकी।

उसने युद्ध लड़ा और पराजित होकर सर्वनाश को प्राप्त हो गया। महाभारत में भारतीय शिष्टाचार का आदर्श रूप देखने को मिलता है। धर्मपुत्र युधिष्ठिर भारतीय शिष्टाचार का सजीव उदाहरण हैं, जैसा कि महाभारत के निम्नलिखित अवतरण से स्पष्ट होता है। इसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर, जो धर्मपुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुए, संजय को संबोधित करते हुए कहते हैं“संजय, धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ… मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं… सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं… मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रमाण करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”.. मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा… सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा।

दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहायजनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा…।” । वास्तव में शिष्टाचार का यह नमूना स्वयं में अद्वितीय है। इसमें आयु, लिंग और बंधुत्व भाव के साथ-साथ कुलीनता, प्रेम, सुंदरता, दासता, विकलांगता और असहायता के आधार पर सभी के प्रति शिष्टाचार प्रकट किया गया है। युधिष्ठिर ने सबसे पहले ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित का अभिवादन किया, क्योंकि उनकी स्थिति समाज में सर्वोच्च थी। तत्पश्चात् उन्होंने अपने गुरु द्रोणाचार्य का नतमस्तक अभिवादन करने की बात कही और फिर कृपाचार्य एवं कुरु वंश के प्रमुख भीष्म पितामह के चरण स्पर्श की, क्योंकि भीष्म आयु में सबसे बड़े और योग्यता की दृष्टि से आदरणीय थे। भीष्म पितामह के अभिवादन के बाद उन्होंने कौरवों के पिता और अपने संबंधी हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र को नमन किया। युधिष्ठिर ने दुर्योधन की दुर्भावनाओं को भुलाकर कौरवों के स्वास्थ्य के विषय में पूछा तथा उन्हें अपनी शुभकामनाएँ भी भेजीं। वे युवा कुरु योद्धाओं को भी नहीं भूले और उन्होंने महामति विदुर का भी सम्मानपूर्वक अभिवादन किया।

अंत में युधिष्ठिर ने वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर स्थित दास, दासियों, विकलांगों, असहायों आदि के प्रति भी अपना अभिवादन भेजा। इस प्रकरण से जहाँ एक ओर युधिष्ठिर की शालीनता एवं विनम्रता का परिचय मिलता है, वहीं यह भी स्पष्ट होता है कि वह वर्ण-व्यवस्था द्वारा स्थापित मानदंडों का पालन करते थे। वास्तव में महाभारत का मूल उद्देश्य भारतीय समाज एवं संस्कृति को जीवन की कुछ मूल मान्यताओं की ओर आकर्षित करना है। महाभारत की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ है जो संपूर्ण भारतीय दर्शन का निचोड़ है। इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों-ज्ञान, कर्म और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत का सर्वाधिक महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे हमें उत्तर वैदिक काल के बाद की कुछ शताब्दियों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशा को जानने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। नि:संदेह राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भारतीय जीवन पर इस महाकाव्य का गंभीर प्रभाव रहा है।

प्रश्न 7.क्या यह संभव है कि महाभारत को एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।

उत्तर:-संभवतः मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ के नाम से जाना जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय व उपलब्धियों के बारे में कविताएँ लिखते थे। ये रचनाएँ मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि पाँचवीं शताब्दी ई०पू० से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अपना अधिकार कर लिया और इसे लिखा। यह वह काल था जब कुरु और पांचाल जिनके इर्द-गिर्द महाभारत की कथा घूमती है, मात्र सरदारी से राजतंत्र के रूप में उभर रहे थे। यह भी संभव है कि नए राज्यों की स्थापना के समय होने वाली उथल-पुथल के कारण पुराने सामाजिक मूल्यों के स्थान पर नवीन मानदंडों की स्थापना हुई जिनका इस कहानी के कुछ भागों में वर्णन मिलता है। लगभग 200 ई०पू० से 200 ईस्वी के बीच हम इस ग्रंथ के रचनाकाल का एक और स्तर देखते हैं।

यह वह समय था जब विष्णु देवता की आराधना प्रभावी हो रही थी तथा श्रीकृष्ण को जो इस महाकाव्य के महत्त्वपूर्ण नायकों में से हैं, उन्हें विष्णु का रूप बताया जा रहा था। कालांतर में लगभग 200-400 ईस्वी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते बृहत् उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए। इन सब परिवर्धनों के कारण यह ग्रंथ जो अपने प्रारंभिक रूप में संभवतः 10,000 श्लोकों से भी कम रहा होगा बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। हालाँकि साहित्यिक परंपरा में इस बृहत रचना के रचियता ऋषि व्यास माने जाते हैं।

प्रश्न 8.आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के मध्य संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर:आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों में अनेक विषमताएँ थीं। हालाँकि स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। विशेषकर पुत्रों को जन्म देने वाली माता के प्रति परिजन अधिक स्नेह अभिव्यक्त करते थे। जिसकी कोख से अधिक सुंदर सुशील, वीर, सद्गुण संपन्न, विद्वान पुत्र पैदा होते थे, समाज में उस स्त्री को नि:संदेह अधिक सम्मान से देखा जाता था। समाज में पितृसत्तात्मक परिवारों का प्रचलन था। पितृवंशिकता को ही सभी वर्गों और जातियों में अपनाया जाता था। कुछ विद्वान और इतिहासकार सातवाहनों को इसका अपवाद मानते हैं। उनके अनुसार सातवाहनों में मातृवंशिकता थी क्योंकि इनके राजाओं के नाम के साथ माता के नाम जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, अभिलेखों से सातवाहन राजाओं की कई पीढ़ियों के राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि राजा वसिथि-पुत्त (सामि) सिरि-पुलुमायि राजा गोतमी-पुत्त सामि-सिरि-यन-सातकनि राजा मधारि-पुत्त स्वामी सकसेन राजा हरिति-पुत्त चत्तरपन-सातकनि राजा हरिति-पुत्त विनहुकद चतुकुलानम्द-सातकमनि राजा गोतमी-पुत्त सिरी-विजये-सातकनि इन सभी नामों में राजा की एक जैसी पदवी पर ध्यान दीजिए। इसके अलावा अगले शब्द को भी लक्षित कीजिए जिसका पुत्त से अंत होता है। यह एक प्राकृत शब्द है जिसका अर्थ ‘पुत्र’ है।

गोतमी-पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि स्त्रीवाची नाम हैं। गौतम और वशिष्ट, ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं। यही नहीं, सातवाहन राजशाही परिवारों में राजा और उसकी पत्नी की आकृतियों को प्रायः मूर्तियों के रूप में विभिन्न गुफाओं की दीवारों पर उत्कीर्ण किया जाता था। ये गुफाएँ और प्रतिमाएँ बौद्ध भिक्षुओं को दान में दी जाती थीं। उपनिषद भी समाज में स्त्री-पुरुषों के अच्छे संबंधों के प्रमाण देते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में जो आरंभिक उपनिषदों में से एक है-आचार्यों और शिष्यों की उत्तरोत्तर पीढ़ियों की सूची मिलती है, जिसमें से कई लोगों को उनके मातृनामों से निर्दिष्ट किया गया है। समाज में विवाहिता स्त्रियाँ अपने पति को सम्मान देती थीं और वे प्रायः उनके गोत्र के साथ जुड़ने में कोई आपत्ति नहीं करती थीं। एक ब्राह्मणीय पद्धति जो लगभग 1000 ई०पू० के बाद से प्रचलन में आई, वह लोगों (खासतौर से ब्राह्मणों) को गोत्रों में वर्गीकृत करने की थी। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।

उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्त्वूपर्ण थे-विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं कर सकते थे। क्या इन नियमों का सामान्यतः अनुसरण होता था, इस बात को जानने के लिए हमें स्त्री और पुरुष नामों का विश्लेषण करना पड़ेगा जो कभी-कभी गोत्रों के नाम से उद्धृत होते थे। हमें कुछ नाम सातवाहनों जैसे प्रबल शासकों के वंश से मिलते हैं। स्त्री को परिवार में माता के रूप में पूरा सम्मान मिले, उसका पति भी यह चाहता था। राज्य परिवारों में स्त्रियाँ दरबारों में उपस्थित होती थीं। कुछ स्त्रियों ने स्वयं भी राज्य किया या संरक्षिका बनीं। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को परामर्श देती थीं। यह अलग बात है। कि कई बार माता की सलाह बड़ा राजकुमार नहीं मानता था और वह अपने लालच, क्रोध या गलत स्वभाव के कारण अपनी हर इच्छा को पूरा करना चाहता था। कुछ इसी प्रकार का महाभारत में उल्लेख मिलता है कि जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया तो गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की“शांति की संधि करके तुम अपने पिता, मेरा तथा अपने शुभचिंतकों का सम्मान करोगे। जो पुरुष अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, वह पुरुष ही राज्य की देखभाल कर सकता है। लालच और क्रोध एक बुरी बला है।” किंतु दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी। फलतः उसका अंत बहुत ही बुरा हुआ।

प्रश्न 9.उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।

उत्तर:-* 1. बंधुत्व संबंधी ब्राह्मणीय नियम और उनका सर्वत्र अनुसरण :-

‘कुल’ शब्द परिवार के लिए संस्कृत ग्रंथों में प्रयोग किया गया है और ‘जाति’ शब्द किसी बड़े समूह के लिए प्रयोग किया गया है। बहुधा अपने पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं, पर परिवार में एक-दूसरे के साथ रिश्तों और क्रियाकलापों में भी भिन्नता है।

कई बार एक ही परिवार के लोग भोजन और अन्य संसाधनों का आपस में मिल-बाँटकर इस्तेमाल करते हैं। एक साथ रहते और काम करते हैं। अनुष्ठानों को साथ ही संपादित करते हैं। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं। इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों का विश्लेषण करते हैं। इनका अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे लोगों की सोच का पता चलता है। संभवत: इन विचारों ने लोगों के क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा।

इसी तरह व्यवहार से विचारों में बदलाव आया होगा। महाभारत काल में राज्य परिवारों में बंधत्व संबंधों में बड़ा भारी परिवर्तन आया। एक स्तर पर महाभारत इसी की कहानी है। यह बांधवों के दो दलों, कौरवों और पांडवों के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष का चित्रण करती है। दोनों ही दल कुरु वंश से संबंधित थे, जिनका एक जनपद पर शासन था। यह संघर्ष एक युद्ध में परिणत हुआ जिसमें पांडव विजयी हुए। इनके उपरांत पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। हालाँकि पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी, महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर (राजाओं के संदर्भ में सिंहासन पर भी) अधिकार जमा सकते थे। कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे पर उत्तराधिकारी हो जाता था तो कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अपना अधिकार जमाते थे।

* 2. विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियम और उसका सर्वत्र अनुसरण :-

जहाँ पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्त्वपूर्ण थे, वहाँ इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर देना ही वांछित था। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं और इसका तात्पर्य यह था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था जिससे उचित समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। नये नगरों के उद्भव में सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ।

यहाँ पर निकट और दूर से आकर लोग मिलते थे और वस्तुओं की खरीद-फरोख्त के साथ ही इस नगरीय परिवेश में विचारों का भी आदान-प्रदान होता था। संभवतः इस वजह से आरंभिक व्यवहारों पर प्रश्नचिह्न लगाए गए। इस चुनौती के जवाब में ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार-संहिताएँ तैयार की। ब्राह्मणों को इस आचार-संहिताओं का विशेष रूप से पालन करना होता था, किंतु बाकी समाज को भी इसका अनुसरण करना पड़ता था। लगभग 500 ई०पू० से इन मानदंडों का संकलन धर्मसूत्र व धर्मशास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथों में किया गया। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण मनुस्मृति थी जिसका संकलन लगभग 200 ई०पू० से 200 ईस्वी के बीच हुआ। हालाँकि इन ग्रंथों के ब्राह्मण लेखकों को यह मानना था कि उनका दृष्टिकोण सार्वभौमिक है और उनके बनाए नियमों का सबके द्वारा पालन होना चाहिए, किन्तु वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे। इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी है कि उपमहाद्वीप में फैली क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं की वजह से भी ब्राह्मणों का प्रभाव सार्वभौमिक कदापि नहीं था।

प्रश्न 10. क्या यह संभव है कि महाभारत को एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।

उत्तर: संभवतः मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ के नाम से जाना जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय व उपलब्धियों के बारे में कविताएँ लिखते थे। ये रचनाएँ मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहीं। इतिहासकारों का अनुमान है कि पाँचवीं शताब्दी ई०पू० से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अपना अधिकार कर लिया और इसे लिखा। यह वह काल था जब कुरु और पांचाल जिनके इर्द-गिर्द महाभारत की कथा घूमती है, मात्र सरदारी से राजतंत्र के रूप में उभर रहे थे। यह भी संभव है कि नए राज्यों की स्थापना के समय होने वाली उथल-पुथल के कारण पुराने सामाजिक मूल्यों के स्थान पर नवीन मानदंडों की स्थापना हुई जिनका इस कहानी के कुछ भागों में वर्णन मिलता है। लगभग 200 ई०पू० से 200 ईस्वी के बीच हम इस ग्रंथ के रचनाकाल का एक और स्तर देखते हैं।

यह वह समय था जब विष्णु देवता की आराधना प्रभावी हो रही थी तथा श्रीकृष्ण को जो इस महाकाव्य के महत्त्वपूर्ण नायकों में से हैं, उन्हें विष्णु का रूप बताया जा रहा था। कालांतर में लगभग 200-400 ईस्वी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते बृहत् उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए। इन सब परिवर्धनों के कारण यह ग्रंथ जो अपने प्रारंभिक रूप में संभवतः 10,000 श्लोकों से भी कम रहा होगा बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। हालाँकि साहित्यिक परंपरा में इस बृहत रचना के रचियता ऋषि व्यास माने जाते हैं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.इस अध्याय के मानचित्र की अध्याय 2 के मानचित्र 1 से तुलना कीजिए। कुरु-पांचाल क्षेत्र के पास स्थित महाजनपदों और नगरों की सूची बनाइए। (मानचित्र के लिए कृपया पुस्तक देखें)।

उत्तर:संकेत-शहरों के नाम-हस्तिनापुर, मथुरा, उज्जैन, विराट, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, कुशीनार, वैशाली, सारनाथ, वाराणसी, बोध गया, श्रावस्ती, पाटलिपुत्र। महाजनपदों के नाम-कंबोज, गांधार, कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवंति, चेदि, वत्स, अश्मक, मगध, अंग, कोशल, वज्जि, काशी, पांचाल, मल्ल, कोशांबी।

• दोनों मानचित्रों की तुलना विद्यार्थी स्वयं करें।

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